सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा समझौता
saudi pakistan defense deal nuclear weapons: सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच बुधवार को एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौता हुआ, जो दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाएगा। इस समझौते के अनुसार, अगर एक देश पर हमला होता है, तो उसे दूसरे देश पर हमला माना जाएगा। इस समझौते में एटमी हथियारों के इस्तेमाल का भी प्रावधान है, जिससे इस रक्षा संधि को और भी संवेदनशील बना दिया गया है।

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस संधि पर साइन किए और दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाकर इस समझौते को ऐतिहासिक बताया।
संधि के मुख्य बिंदु और रणनीति
सऊदी प्रेस एजेंसी के अनुसार, यह रक्षा समझौता दोनों देशों की सुरक्षा को बढ़ावा देने और वैश्विक शांति स्थापित करने के लिए किया गया है। इस संधि में दो मुख्य बिंदु हैं:
- साझा सुरक्षा:
- अगर एक देश पर हमला होता है, तो यह दूसरे देश के लिए भी एक हमला माना जाएगा। इसका मतलब यह है कि दोनों देशों के बीच मिलकर एक दूसरे की रक्षा की जाएगी।
- सैन्य सहयोग:
- इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग को बढ़ावा मिलेगा, जिसमें हथियारों की आपूर्ति, प्रशिक्षण और अन्य सैन्य गतिविधियां शामिल हैं।
पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का प्रावधान
रॉयटर्स के एक सीनियर सऊदी अधिकारी ने पुष्टि की है कि इस रक्षा समझौते में पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का इस्तेमाल भी शामिल हो सकता है, यदि आवश्यकता पड़ी तो। इस पर पाकिस्तान के अधिकारियों ने चुप्पी साधी, लेकिन इसे लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा शुरू हो गई है। क्या सऊदी अरब पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के ‘गुप्त सहयोगी’ के रूप में उभर रहा है? यह सवाल कई विशेषज्ञ उठा रहे हैं।
पाकिस्तान की भूमिका और क्षेत्रीय प्रभाव
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और सेना प्रमुख भी इस समझौते के दौरान मौजूद थे। सऊदी अरब और पाकिस्तान दोनों देशों ने इस रक्षा साझेदारी को एक रणनीतिक गठबंधन के रूप में देखा है, जो भविष्य में एक-दूसरे की मदद करेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता किसी खास देश या घटना के खिलाफ नहीं है, बल्कि एक गहरे और दीर्घकालिक सैन्य सहयोग को औपचारिक रूप देने के लिए है।
कतर और इजराइल के संदर्भ में पाकिस्तान की भूमिका
इस समझौते के बाद पाकिस्तान ने मुस्लिम देशों के लिए एक जॉइंट डिफेंस फोर्स बनाने का सुझाव दिया था। 14 सितंबर को कतर में आयोजित एक बैठक में पाकिस्तान ने मुस्लिम देशों को NATO जैसी एक सैन्य ताकत बनाने की बात की थी, जो इजराइल के खिलाफ संयुक्त रूप से लड़ सके।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और रणनीतिक पहलू
पूर्व अमेरिकी राजनयिक जलमय खलीलजाद ने इस समझौते पर टिप्पणी की है कि यह एक औपचारिक संधि नहीं हो सकती, लेकिन इसकी गंभीरता को देखते हुए इसे एक बड़ा रणनीतिक कदम माना जा सकता है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि….
क्या इस संधि में कोई गुप्त प्रावधान हैं, जो सऊदी अरब को अमेरिका की सुरक्षा गारंटी से अधिक आत्मनिर्भर बनाते हैं?
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस समझौते से सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग और अधिक मजबूत हो सकता है, जिससे वे दोनों वैश्विक मंच पर एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकते हैं।
पुराना पाकिस्तान-अमेरिका रक्षा समझौता और टूटने की वजह
यह समझौता सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक नया अध्याय है,
लेकिन….
इतिहास में पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ भी एक रक्षा समझौता किया था।
- 1950 के दशक में पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ म्यूचुअल डिफेंस असिस्टेंस एग्रीमेंट (MDAA) पर हस्ताक्षर किए थे।
- यह समझौता 1979 में टूट गया, जब अमेरिका ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के कारण सैन्य सहायता पर प्रतिबंध लगा दिया।
इससे पहले, पाकिस्तान ने SEATO और CENTO जैसे सैन्य गठबंधनों में भी भाग लिया था, जो नाटो के समान थे और इसमें सामूहिक सुरक्षा का प्रावधान था।
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