russia ukraine peace talks – istanbul trump reaction : तुर्की में ऐतिहासिक वार्ता, ट्रंप बोले- मेरे बिना कोई डील नहीं
russia ukraine peace talks – istanbul trump reaction : एक ऐतिहासिक कूटनीतिक मोड़ लेते हुए, रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधि पहली बार आमने-सामने शांति वार्ता के लिए तुर्की के इस्तांबुल में मिले हैं। यह पहली बार है जब दोनों पक्षों ने इतने उच्चस्तरीय और प्रत्यक्ष संवाद की पहल की है।
लेकिन इन वार्ताओं से पहले ही एक बड़ा राजनीतिक बयान चर्चा में आ गया — पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि “बिना उनके यह डील संभव ही नहीं है।”
🛬 यूक्रेन और रूस के प्रतिनिधिमंडल पहुंचे इस्तांबुल
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने घोषणा की कि उन्होंने अपने रक्षा मंत्री रुस्तम उमारोव के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल इस्तांबुल भेजा है।
उधर, रूस की ओर से व्लादिमीर मेडिंस्की, जो पुतिन के करीबी माने जाते हैं, अपने प्रतिनिधियों के साथ इस्तांबुल पहुंच चुके हैं।
👉 यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब जंग ने तीसरे वर्ष में प्रवेश कर लिया है और हज़ारों जानें जा चुकी हैं।
❌ पुतिन ने वार्ता से खुद को अलग किया
जहां ज़ेलेंस्की की ओर से प्रतिनिधिमंडल भेजा गया, वहीं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुद बातचीत में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया।
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने साफ कर दिया कि पुतिन की फिलहाल ट्रंप से मिलने या किसी वैश्विक सम्मेलन में भाग लेने की कोई योजना नहीं है।
🗣️ ट्रंप का बड़ा बयान: मेरे बिना डील नामुमकिन
पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा:
“जब तक मैं और पुतिन साथ में नहीं बैठते, तब तक कोई शांति समझौता नहीं हो सकता। चाहे आपको पसंद हो या नहीं।”
ट्रंप का यह बयान उस वक्त आया जब वह कतर से अबू धाबी की यात्रा कर रहे थे। ट्रंप पहले भी दावा कर चुके हैं कि अगर वे राष्ट्रपति होते, तो युद्ध कभी शुरू ही नहीं होता।
📢 ज़ेलेंस्की का स्पष्ट रुख: रूस को कोई ज़मीन नहीं देंगे
ज़ेलेंस्की ने कहा:
“हम कभी भी अपनी ज़मीन का कोई टुकड़ा रूस को नहीं देंगे। यह भूमि यूक्रेन की है और हमेशा यूक्रेन की रहेगी।”
रूस बार-बार मांग करता रहा है कि:
- क्रीमिया
- डोनेट्स्क
- लुहांस्क
- ज़ापोरिज्जिया
को आधिकारिक रूप से रूस का हिस्सा माना जाए। लेकिन ज़ेलेंस्की ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है।
🔥 रूस पर और प्रतिबंधों की चेतावनी
अगर रूस गंभीरता से शांति प्रक्रिया में भाग नहीं लेता, तो ज़ेलेंस्की ने कहा कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और सख्त प्रतिबंधों की मांग करेंगे।
अमेरिका और यूरोपीय देशों ने पहले ही रूस को चेताया है कि अगर वह 30-दिन के संघर्षविराम प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करता, तो उस पर बड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाएंगे।
🕊️ तुर्की की भूमिका: मध्यस्थता की उम्मीद
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन इस वार्ता को सफल बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
उनकी सरकार ने कई बार दोनों देशों के बीच मध्यस्थता की पेशकश की है और अब इस्तांबुल में यह बैठक उसी कड़ी का हिस्सा है।
🧭 क्या यह वार्ता जंग का अंत लाएगी? विशेषज्ञों की राय
राजनयिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह वार्ता शांति की दिशा में एक छोटा लेकिन सकारात्मक कदम है।
हालांकि:
- पुतिन का वार्ता में हिस्सा न लेना
- ट्रंप की गैर-सरकारी भूमिका
- रूस की ज़मीन पर अड़ियल मांगें
इन सबके चलते वास्तविक समझौते की राह कठिन दिख रही है।
📜 संघर्षविराम या नई रणनीति?
अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे राष्ट्रों ने इस वार्ता को लेकर उम्मीद जताई है, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट किया है कि:
- संघर्षविराम सिर्फ कागजों पर नहीं होना चाहिए
- यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता
- रूस को युद्धविराम की ईमानदार कोशिश करनी होगी
🔍 ज़ेलेंस्की ने कहा – अकेले हम काफी नहीं हैं
ज़ेलेंस्की ने एक भावनात्मक बयान में कहा:
“हम हरसंभव कोशिश कर रहे हैं लेकिन अकेले हमारे प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। हमें वैश्विक समर्थन चाहिए—प्रतिबंधों के माध्यम से रूस पर दबाव बनाना जरूरी है।”
🧠 नई शुरुआत या पुरानी रणनीति?
इस पहली आमने-सामने की वार्ता ने दुनिया को उम्मीद की एक किरण दिखाई है। लेकिन जब तक पुतिन और ट्रंप जैसे प्रभावशाली नेता सक्रिय रूप से शामिल नहीं होते, तब तक:
- शांति समझौता सिर्फ एक कागजी कवायद रह सकता है
- युद्ध के मैदान से हटकर मेज पर हल निकालना मुश्किल रहेगा
फिलहाल सबकी निगाहें इस्तांबुल पर हैं — क्या यहां से इतिहास बदलेगा या दोहराया जाएगा?
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