RSS प्रमुख ने बताया हिंदू समाज को बांधने का अनूठा सूत्र
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने पुणे में आयोजित दिवंगत आयुर्वेदाचार्य पी.वी.खडीवाले की जीवनी विमोचन समारोह में बताया कि RSS का सबसे केंद्रीय विचार ‘अपनापन’ है। उनका कहना था, “अगर RSS को एक शब्द में बताया जाए, तो वह ‘अपनापन’ होगा।” साझा प्रेम और आत्मीयता के बंधन की शक्ति को उन्होंने संघ का मूल आधार बताया।
“मानव बुद्धि ठीक इस्तेमाल हो तो श्रेष्ठ; बुराई से बचाता है अपनापन”
भागवत ने कहा कि बुद्धि इंसान को महान बना सकती है, लेकिन अगर गलत दिशा में उपयोग हुई, तो विनाश भीकर सकती है। ऐसे समय में “अभिन्न अपनापन और स्नेह” ही एकमात्र बचाव है। उन्होंने ‘giving-back’ शब्द को उदाहरण दिया और कहा कि भारत में यह भावना सदियों से रही है यह संघ में आत्मीयता को प्रदर्शित करती है।
Hindu Society को एक सूत्र में पिरोना RSS का लक्ष्य
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य सिर्फ हिन्दू समाज को संगठित नहीं करना, बल्कि उसे एक ऐसे आत्मीय और प्यारे समुदाय में बदलना है, जो देश और विश्व को भी अपनत्व की भावना से जोड़े। यह विचार आधुनिक दुनिया में ‘unity in diversity’ से भी ऊपर उठकर एक गहरे संबंध की ओर ले जाता है।
शताब्दी समारोह: संघ की 100वीं वर्षगांठ का भव्य आगाज़
RSS अपने 100 साल पूरे होने पर पूरे भारत में शताब्दी वर्ष समारोह का आयोजन कर रहा है।
- 26 अगस्त से शुरू होगी पहली तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला दिल्ली में, इसके बाद
- मुंबई, बेंगलुरु, और कोलकाता में भी आयोजन होंगे,
- 2 अक्टूबर विजयादशमी के दिन पूरे देशव्यापी कार्यक्रम आयोजित होंगे।
भागवत ने यह जानकारी दी और सभी वर्गों को इस फैले हुए शताब्दी आयोजन में शामिल होने का आह्वान किया।
RSS की वैश्विक और सामाजिक चिंताएं
भागवत ने कहा कि RSS हिंदुत्व को अपनाने के बजाय धर्मनिरपेक्ष अपनापन में विश्वास रखता है – “हम सर्वलोक‑युक्त भारत के लोग हैं”
क्या चुनौतियां हैं RSS के सामने?
- बुद्धि का युक्तिमूलक उपयोग और समय‑समय पर चेतावनी बुरे प्रयोगों से बचने के लिए RSS का सतर्क संदेश है।
- ‘अपनापन’ का सार्वभौमिक स्वरूप हिंदू एकता प्रदान करता है, लेकिन क्षेत्रीय व धार्मिक असहमति इसे चुनौती दे सकते हैं।
- शताब्दी वर्ष के आयोजन में शहरी और ग्रामीण कार्यकर्ताओं की भागीदारी, संवेदनशीलता और जागरूकता ही इसे सफल बनाएंगे।
मोहन भागवत का संदेश स्पष्ट है RSS का मूल आत्मीयता और अपनापन है, जो हिंदू समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करता है, लेकिन इसे राष्ट्रीय और वैश्विक संदर्भ में फैला भी देना चाहिए। 26 अगस्त से शुरू हो रहे शताब्दी समारोह में यह संदेश और व्यापक रूप से पहुंचाया जाएगा।

