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आरएसएस सरसंघचालकों के उद्बोधनों का देश, काल और परिस्थितियों से संबंध

Shital Sharma May 10, 2025

प.पू. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन प.पू. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी, और तब से संघ के सरसंघचालकों के विजयादशमी उद्बोधन तथा अन्य मौकों पर दिए गए उद्बोधन एक महत्वपूर्ण परंपरा बन गए हैं। ये उद्बोधन न केवल संघ के स्वयंसेवकों को प्रेरित करते हैं, बल्कि देश की समसामयिक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करते हुए समाज को दिशा प्रदान करते हैं।

अगर शुरूआत से हम देखें कि विभिन्न सरसंघचालकों के उद्बोधन कैसे देश के काल और परिस्थितियों से जुड़े रहे हैं, और कैसे वे राष्ट्र और समाज की दशा तथा दिशा को प्रभावित करते आए हैं। तो ये ऐतिहासिक संदर्भों, प्रमुख उद्बोधनों और उनके प्रभाव पर आधारित है, जो दर्शाता है कि ये उद्बोधन संकट के समय में एकजुटता का आह्वान करते हैं।

आरएसएस की स्थापना और प्रारंभिक उद्बोधन

आरएसएस की स्थापना ऐसे समय हुई जब भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था। प. पू. डॉ. हेडगेवार के उद्बोधन मुख्य रूप से हिंदू समाज की एकजुटता और चरित्र निर्माण पर केंद्रित थे, जो उस समय की सामाजिक विखंडन और विदेशी शासन की चुनौतियों को प्रतिबिंबित करते थे। विजयादशमी को संघ की स्थापना का दिन चुनना प्रतीकात्मक था, क्योंकि यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। हेडगेवार के उद्बोधनों में राष्ट्रवाद और अनुशासन पर जोर था, जो स्वतंत्रता आंदोलन की आवश्यकताओं से जुड़ा था। हालांकि उनके उद्बोधनों के लिखित रूप कम उपलब्ध हैं, लेकिन संघ की प्रारंभिक गतिविधियां दर्शाती हैं कि ये उद्बोधन समाज को संगठित करने का माध्यम थे।

प. पू. एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी) के उद्बोधन

1940 से 1973 तक सरसंघचालक रहे प. पू. एम.एस. गोलवलकर के उद्बोधन भारत के सबसे चुनौतीपूर्ण कालखंड स्वतंत्रता, विभाजन और उसके बाद की अस्थिरता से जुड़े थे। 1947 के विभाजन के दौरान हिंदू-सिख शरणार्थियों की रक्षा में संघ की भूमिका प्रमुख थी, और गोलवलकर के उद्बोधन हिंदू राष्ट्रवाद पर केंद्रित थे। गुरुजी की पुस्तक ‘वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड’ और उद्बोधनों में मुसलमानों तथा ब्रिटिश के प्रति दृष्टिकोण का विरोध हुआ, लेकिन संदर्भ में यह विभाजन की हिंसा से उपजा था।

एम.एस. गोलवलकर (गुरुजी)

उदाहरणस्वरूप, विभाजन के समय उनके उद्बोधनों ने हिंदुओं को एकजुट रहने और राष्ट्र की रक्षा करने का आह्वान किया, जो उस समय की सामाजिक अराजकता को दर्शाता था। गोलवलकर ने ब्रिटिश विरोध में संघ को ‘भारत का तलवारबाज’ बनाया, और उनके उद्बोधन समाज की दिशा को हिंदू एकता की ओर मोड़ते थे। इसे रक्षात्मक रणनीति माना गया।

प. पू. बालासाहेब देवरस के उद्बोधन

बालासाहेब देवरस

1973 से 1994 तक सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के समय भारत ने 1975 का आपातकाल देखा, जब इंदिरा गांधी सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। देवरस के जेल से लिखे पत्र और उद्बोधन उस समय की राजनीतिक दमन को प्रतिबिंबित करते हैं। उन्होंने इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर संघ की भूमिका स्पष्ट की, लेकिन इसमें सहयोग या विरोध की बहस है। उनके उद्बोधनों ने लोकतंत्र की रक्षा और सामाजिक सद्भाव पर जोर दिया, जो आपातकाल के बाद जनता पार्टी के गठन में संघ की भूमिका को दर्शाता है। यह काल दर्शाता है कि संघ के उद्बोधन कैसे राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़े रहते हैं, और समाज को लोकतांत्रिक मूल्यों की दिशा में प्रेरित करते हैं।

प. पू. के.एस. सुंदर्शन और प. पू. राजेंद्र सिंह

प. पू. के.एस. सुंदर्शन

प. पू. राजेंद्र सिंह (1994-2000) और प. पू. के.एस. सुंदरशन (2000-2009) के उद्बोधनों में वैश्वीकरण, आर्थिक सुधार और सांस्कृतिक चुनौतियां प्रमुख थीं। प. पू. सुंदर्शन के उद्बोधनों में जनसंख्या असंतुलन, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और सांस्कृतिक आक्रमण पर चर्चा हुई, जो उस समय की सामाजिक परिवर्तनों को दर्शाती थी। ये उद्बोधन समाज को स्वदेशी और सांस्कृतिक जागरण की दिशा में ले जाते थे।

प. पू. राजेंद्र सिंह

प. पू. डॉ. मोहन भागवत के उद्बोधन

2009 से सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के विजयादशमी उद्बोधन तथा अन्य उद्बोधन समसामयिक मुद्दों से सीधे जुड़े हैं। 2024 के उद्बोधन में उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार, गाजा-इजराइल संघर्ष, आरजी कर अस्पताल की घटना, ‘डीप स्टेट’, ‘वोकिज्म’ और सांस्कृतिक मार्क्सवाद पर चर्चा की।

उन्होंने जातिगत असमानता दूर करने, दलितों और कमजोर वर्गों से जुड़ने का आह्वान किया, जो भारत की सामाजिक दशा को दर्शाता है। 2023 के उद्बोधन में महावीर स्वामी की अहिंसा और नैतिकता पर जोर दिया गया, जबकि 2022 में सामंजस्यपूर्ण भारत की बात की गई। ये उद्बोधन वैश्विक युद्धों, महामारी और सामाजिक विभाजन से निपटने की दिशा देते हैं।

प. पू. डॉ. मोहन भागवत

2025 में प. पू. भागवत के उद्बोधन संघ की शताब्दी वर्ष के संदर्भ में अधिक सक्रिय रहे, जो वैश्विक आर्थिक दबावों जैसे अमेरिका द्वारा भारत पर 50% टैरिफ और सामाजिक मुद्दों को प्रतिबिंबित करते हैं। जनवरी 2025 के गणतंत्र दिवस पर ठाणे (महाराष्ट्र) में उन्होंने युवाओं से विविधता का सम्मान करने और सद्भाव में जीने का आह्वान किया, कहते हुए कि ‘विविधता जीवन का प्राकृतिक हिस्सा है, और खुशी परिवार तथा समाज की खुशी से जुड़ी है।’

फरवरी में पश्चिम बंगाल में हिंदू समाज की एकता पर जोर दिया। अप्रैल में दिल्ली में ABVP कार्यक्रम में और अन्य मौकों पर स्वार्थपरता की आलोचना की तथा हिंदू शास्त्रों को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया, कहते हुए कि ‘दुनिया भारत की ओर नेतृत्व के लिए देख रही है।’
मई में हिंदू एकता और सेना को मजबूत बनाने पर बल दिया। जुलाई में कोच्चि में शिक्षा में भारतीयता पर उद्बोधन दिया, कहते हुए कि ‘देश को अपनी पहचान परंपरा पर आधारित बनाए रखनी चाहिए’

Relation of the speeches of RSS Sarsanghchalaks with the country, time and circumstances

अगस्त में नागपुर में आध्यात्मिकता पर जोर दिया कि ‘धर्म और अध्यात्म से भारत विश्वगुरु बनेगा,’ तथा स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत की आवश्यकता बताई। अगस्त 27-29 के दिल्ली शताब्दी समारोह में ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ श्रृंखला में हिंदुत्व को सत्य और प्रेम बताया, अखंड भारत के डीएनए पर चर्चा की, जाति व्यवस्था को अप्रासंगिक कहा, आरक्षण का समर्थन किया जब तक लाभार्थी इसे आवश्यक मानें, जनसांख्यिकीय असंतुलन जो अवैध प्रवासन, धर्मांतरण जैसे विषयों पर चिंता जताई, तथा स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया कि ‘अंतरराष्ट्रीय व्यापार दबाव में नहीं, स्वैच्छिक होना चाहिए।’

उन्होंने संघ-सरकार संबंधों में मतभेद लेकिन कोई झगड़ा नहीं होने की बात कही, तथा 75 वर्ष की सेवानिवृत्ति पर स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा। ये उद्बोधन वैश्विक व्यापार दबावों, जनसांख्यिकीय परिवर्तनों और सामाजिक सुधारों को दर्शाते हैं, समाज को आत्मनिर्भरता और एकता की दिशा में प्रेरित करते हैं।

देश दुनिया की दशा और दिशा का प्रतिबिंब

आरएसएस सरसंघचालकों के उद्बोधन देश के काल और परिस्थितियों से गहराई से जुड़े रहे हैं, जो संकट में एकजुटता और सांस्कृतिक मूल्यों का आह्वान करते हैं। ये उद्बोधन समाज की दशा को उजागर करते हुए दिशा प्रदान करते हैं। स्पष्ट है कि संघ वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और सामाजिक सुधारों पर फोकस कर रहा है, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को इतिहास से सीखकर भविष्य की ओर ले जाते हुए।
अंततः, ये कहा जा सकता है सरसंघचालकों के उद्बोधन राष्ट्र निर्माण का हिस्सा हैं।

लेखक – हितेंद्र शर्मा

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