रावण की अनकही गाथा रावण एक महापंडित, शिव भक्त और विद्वान
रावण की अनकही कहानी: “मैं रावण हूँ” – यह सुनते ही आपके मन में क्या चित्र उभरता है? शायद एक दशमुखी राक्षस का, जिसने माता सीता का हरण किया था? या फिर उस अहंकारी राजा का जो भगवान राम के हाथों मारा गया? लेकिन क्या आपको पता है कि मैं, रावण, सिर्फ एक खलनायक नहीं था। मैं था एक महापंडित, एक प्रकांड विद्वान, एक महान शासक और भगवान शिव का परम भक्त।
रावण की गाथा: आज मैं आपको अपनी वह कहानी सुनाता हूँ जो दुनिया भूल गई है। मेरे जीवन के उन पहलुओं के बारे में बताता हूँ जिन्हें इतिहास ने दबा दिया है।
रावण का असली इतिहास: मेरा परिचय
मैं रावण था, लेकिन मेरा जन्म नाम दशानन था। मेरे पिता महर्षि विश्रवा और दादा महर्षि पुलस्त्य थे। मैं ब्राह्मण वंश से था, राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद भी मेरे अंदर ज्ञान की प्यास थी।
रावण की शिक्षा:
मैंने चार वेदों और छह शास्त्रों में पूर्ण निपुणता हासिल की थी। मेरे दस सर केवल भौतिक नहीं थे – वे मेरे विशाल ज्ञान के प्रतीक थे। चार वेदों और छह शास्त्रों की पूर्ण जानकारी ने मुझे दशानन बनाया था।
जब भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापना का यज्ञ करवाना चाहा, तो उन्होंने सबसे बड़े पंडित की तलाश की। और वह पंडित मैं था – उनका शत्रु होने के बावजूद भी। क्योंकि मुझसे बड़ा विद्वान उस समय कोई नहीं था।
मेरी भक्ति – शिव के परम भक्त की गाथा
रावण एक महापंडित:
लोग कहते हैं मैं राक्षस था, लेकिन वे भूल जाते हैं कि मैं भगवान शिव का सबसे बड़ा भक्त था। जब मैंने कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया और भगवान शिव के पैर के नीचे दब गया, तो मेरी पीड़ा से निकली वह आवाज़ से भगवान शिव ने मुझे “रावण” नाम दिया – जिसका अर्थ है “गर्जना करने वाला”।
रावण और शिव भक्ति:
उसी पीड़ा और भक्ति में मैंने “शिव तांडव स्तोत्र“ की रचना की । मैंने अपनी नसों को वीणा के तार की तरह इस्तेमाल किया और भगवान शिव की स्तुति की। यह स्तोत्र आज भी शिव भक्ति में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
रावण के ग्रंथ – ज्ञान का भंडार
रावण और शिव भक्ति:
मैंने केवल युद्ध नहीं किया, बल्कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना भी की:
रावण संहिता –
इसमें मैंने आयुर्वेद, ज्योतिष और चिकित्सा विज्ञान का विस्तृत वर्णन किया है। आज भी वैद्य इस ग्रंथ का अध्ययन करते हैं।
अरुण संहिता –
हस्तरेखा, जन्मकुंडली और सामुद्रिक शास्त्र की जानकारी इसमें मिलती है।
नाड़ी परीक्षा –
मनुष्य के नर्वस सिस्टम और नाड़ी चिकित्सा के बारे में यह अद्भुत ग्रंथ है।
कुमारतंत्र –
बाल रोगों के उपचार की विधि इसमें वर्णित है।
इसके अतिरिक्त मैंने इंद्रजाल, अंक प्रकाश, उड्डीशतंत्र, प्राकृत लंकेश्वर जैसे अनेक ग्रंथ लिखे थे।
मेरी अशोक वाटिका – प्रकृति प्रेम का प्रमाण
जब मैंने माता सीता को लंका में रखा, तो मैंने उन्हें सोने के महल में नहीं, बल्कि अशोक वाटिका में रखा। इसके पीछे मेरी मजबूरी भी थी और दया भी। अशोक का पेड़ दुख हरता है – मैं चाहता था कि माता सीता का दुख कम हो जाए।
रावण और अशोक वाटिका:
मेरी अशोक वाटिका में एक लाख से अधिक अशोक के वृक्ष थे। यह वाटिका दिव्य पुष्पों और फलों से भरी हुई थी। आज भी श्रीलंका में यह स्थान मौजूद है और वहाँ की काली मिट्टी हनुमान द्वारा लंका दहन की गवाही देती है।
मेरी राजनीति – एक कुशल शासक
भगवान राम ने स्वयं लक्ष्मण को मेरे पास राजनीति की शिक्षा लेने भेजा था। मैं केवल योद्धा नहीं था, बल्कि एक कुशल राजनीतिज्ञ भी था[। मेरे शासनकाल में लंका सोने की थी – यह वैभव और समृद्धि का प्रतीक था।
मैंने अपने तपबल से देवलोक पर विजय पाई थी और यमलोक तक पर नियंत्रण किया था। मैंने नरक में भोग रही आत्माओं को भी मुक्त करके अपनी सेना में शामिल किया था।
मेरी मर्यादाएं – एक श्रापित राजा
लोग भूल जाते हैं कि मैंने कभी माता सीता को स्पर्श नहीं किया था। इसका कारण नलकुबेर का श्राप था। उन्होंने मुझे श्राप दिया था कि यदि मैं किसी स्त्री को उसकी इच्छा के बिना स्पर्श करूंगा तो मेरा सिर फट जाएगा। यही कारण था कि मैंने माता सीता के साथ मर्यादा बनाए रखी।
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मेरी विशेषताएं – रहस्यमय तथ्य
कुछ ऐसी बातें हैं जो शायद ही कोई जानता हो:
- मेरे रथ में घोड़ों की जगह गधे लगे हुए थे, यह वाल्मीकि रामायण में वर्णित है।
- मैंने शनिदेव को बंदी बना लिया था क्योंकि वे मेरे पुत्र मेघनाद की कुंडली में सही स्थिति में नहीं बैठ रहे थे।
- कुबेर मेरा सौतेला भाई था और सोने की लंका असल में उसकी थी, जिसे मैंने बलपूर्वक छीन लिया था।
मेरी शिक्षाएं – मृत्यु शैया पर दिए गए अमूल्य उपदेश
जब मैं मरणासन्न था, तो भगवान राम ने लक्ष्मण को मेरे पास भेजा था कि वे मुझसे जीवन की शिक्षा लें। मैंने उन्हें तीन महत्वपूर्ण सीखें दीं:
- शुभस्य शीघ्रम – शुभ कार्य में कभी देरी न करे
- शत्रु को कभी तुच्छ न समझें – मैंने वानरों को छोटा समझा था, यही मेरी भूल थी
- किसी को तुच्छ न मानें – हर व्यक्ति और वस्तु का अपना महत्व होता है
मेरे गुण – एक बहुआयामी व्यक्तित्व
- तपस्वी और जिज्ञासु: मैंने कठोर तप से अनेक वरदान प्राप्त किए थे।
- संगीतकार: मैंने वीणा का आविष्कार किया और संगीत की नई धाराएं स्थापित कीं।
- आयुर्वेदाचार्य: मेरे पास सुषेण जैसे महान वैद्य थे। मैं स्वयं औषधि विज्ञान का ज्ञाता था।
- ज्योतिषी: मैं भविष्य देख सकता था और ग्रहों की गति को भी प्रभावित कर सकता था।
- वास्तुकार: मेरी सोने की लंका वास्तुकला का अद्भुत नमूना थी।
मेरी भूलें – अहंकार का परिणाम
मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरे अंदर अहंकार था। मेरे विशाल ज्ञान और शक्ति ने मुझे घमंडी बना दिया था। मैंने सोचा था कि मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ और कोई मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
मैंने प्रभु श्री राम को पहचानने में देरी की। यदि मैंने पहले ही उनकी शरण ली होती तो मेरी यह गति नहीं होती।
आधुनिक संदेश – रावण से सीखने योग्य बातें
आज के युग में भी मेरे जीवन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है:
- ज्ञान अर्जन: मैंने 64 कलाओं में निपुणता हासिल की थी। आज के युग में भी बहुआयामी ज्ञान की आवश्यकता है।
- निडरता: मैं कभी किसी से नहीं डरा। जीवन में सफलता के लिए निडरता आवश्यक है।
- भक्ति: मेरी शिव भक्ति निष्कपट थी। सच्ची भक्ति व्यक्ति को महान बनाती है।
- नवाचार: मैं हमेशा नए आविष्कार करता रहता था। यह गुण आज भी प्रासंगिक है।
- समर्पण: जो भी कार्य मैं करता ता था।था, पूरी लगन से कर
जैन परंपरा में मेरा स्थान
जैन धर्म की दृष्टि से देखें तो मैं एक प्रति–नारायण था और 64 शलाका पुरुषों में मेरी गिनती होती है। जैन पुराणों के अनुसार मैं आगामी चौबीसी में तीर्थंकर बनूंगा।
अहंकार की सीख – मेरे पतन की कहानी
लेकिन सबसे बड़ी सीख यह है कि अहंकार सब कुछ नष्ट कर देता है। मेरे पास सब कुछ था – ज्ञान, शक्ति, वैभव, भक्ति – लेकिन अहंकार ने सब कुछ खत्म कर दिया।
मैं चाहता हूँ कि लोग मेरी अच्छाइयों से सीखें लेकिन मेरी भूलों से भी सबक लें। अहंकार कभी न करें। शक्ति का सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं।
समापन – एक संतुलित दृष्टिकोण
मैं रावण हूँ – न तो पूरी तरह खलनायक, न ही पूरी तरह नायक। मैं एक इंसान था जिसमें अच्छाइयां भी थीं और बुराइयां भी। मेरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति में कई गुण हो सकते हैं लेकिन एक भी दोष उसे बर्बाद कर सकता है।
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मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे केवल माता सीता के हरणकर्ता के रूप में नहीं बल्कि एक महापंडित, एक भक्त, एक विद्वान के रूप में भी याद रखें। मेरे जीवन से अच्छाइयाँ अपनाएं और बुराइयों से दूर रहें।
क्योंकि मैं सिर्फ रावण नहीं था – मैं दशानन था, महापंडित था, शिव भक्त था। मैं एक पूर्ण व्यक्तित्व था जिसमें ज्ञान की गंगा बहती थी।
रावण का ज्ञान: यह है मेरी कहानी – रावण की कहानी। अब आप तय करें कि आप मुझसे क्या सीखना चाहते हैं।
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