सर्पदंश का जहर उतरने की है मान्यता
छत्रपति शिवाजी महाराज ने कराया था निर्माण

Ratangarh Mata Temple: मध्य प्रदेश में कई चमत्कारिक मंदिर हैं, इन्हीं में से एक है दतिया का रतनगढ़ माता मंदिर, जिसके चमत्कारों की कहानी दूर दूर तक फैली हुई है। इसलिए यहां भाईदूज पर मेला भी लगता है। इस मंदिर का शिवाजी से भी नाता है जाने क्या है मंदिर की महिमा.
Ratangarh Mata Temple:माता के दरबार में पहुंचे 35 लाख श्रद्धालु

दतिया में रतनगढ़ माता मंदिर पर लगे लख्खी मेले में 35 लाख श्रद्धालु पहुंचे हैं। शनिवार से शुरू मेला सोमवार सुबह तक चलेगा। मध्यप्रदेश के अलावा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली सहित अन्य प्रांतों से भी लोग लगातार यहां पहुंच रहे हैं। मान्यता है कि रतनगढ़ माता के मंदिर पर सर्पदंश पीड़ितों का जहर उतर जाता है। इसलिए श्रद्धालु यहां बंध कटवाने के लिए पहुंच रहे हैं। इनमें से कुछ श्रद्धालु तो पिंड भरकर यानी जमीन पर लेटकर यहां आ रहे हैं।
Ratangarh Mata Temple:ये है मान्यता

स्थानीय लोगों और यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मान्यता है कि रतनगढ़ माता मंदिर की मिट्टी और भभूत में बहुत शक्ति है। इसके कारण जो कोई भक्त बीमार रहता है और यहां आकर भभूत खाता है, उसके सारे रोग दूर हो जाते हैं। इतना ही नहीं मंदिर की मिट्टी खाते ही जहरीले जीवों का जहर भी बेअसर हो जाता है बंध कटवाने पहुंचते हैं सर्पदंश पीड़ित भक्त मानते हैं कि कुंवर बाबा यानी कुंवर गंगा रामदेव रतनगढ़ वाली माता के भाई हैं। वे अपनी बहन से बेहद स्नेह करते थे। कुंवर बाबा जब जंगल में शिकार करने जाते थे, तब सारे जहरीले जानवर अपना विष बाहर निकाल देते थे.
Ratangarh Mata Temple:मंदिर में देश का सबसे वजनी 1935 किलो का घटा

रतनगढ़ माता मंदिर धार्मिक और प्राकृतिक वैभव के साथ डकैतों के आराध्यस्थल के रूप में भी विख्यात है। तीन प्रदेश- मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में फैली चंबल घाटी के डकैत भी यहां आते रहे हैं। वे पुलिस को चैलेंज देकर इस मंदिर में दर्शन करने आते थे। इस दौरान एक भी डकैत पकड़ा नहीं गया। माधव सिंह, मोहर सिंह, मलखान, मान सिंह, जगन गुर्जर से लेकर फूलन देवी ने माता के चरणों में माथा टेका है। वे यहां घंटा चढ़ाकर माता का आशीर्वाद लेते थे रतनगढ़ के माता मंदिर में देश का सबसे बड़ा वजनी घंटा भी चढ़ाया गया है। 1935 किलो के इस घंटे को मंदिर में चढ़ाए गए अन्य घंटों को गलाकर निकली पीतल से बनाया गया है।
Ratangarh Mata Temple: मंदिर का इतिहास
प्रसिद्ध रतनगढ़ माता के मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। स्थानीय लोगों के अनुसार मध्यकाल में मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी ने रतनगढ़ पर कब्जा करने की नीयत से सेंवढा से रतनगढ़ आने वाला पानी बंद करा दिया था, तब रतन सिंह की बेटी मांडूला और उनके भाई कुंवर गंगा रामदेव ने अलाउद्दीन खिलजी के फैसले का कड़ा विरोध किया। इस पर नाराज खिलजी ने वर्तमान मंदिर रतनगढ़ वाली माता के परिसर में बने किले पर आक्रमण कर दिया। बताते हैं कि रतन सिंह की खूबसूरत बेटी मांडुला पर भी खिलजी की बुरी नजर थी। मुस्लिम आक्रमणकारियों की बुरी नजर से बचने के लिए बहन मांडुला जंगल में समाधि ले ली और धरती मां से प्रार्थना की, कि वो उन्हे अपनी गोद में स्थान दें। मान्यता है कि जिस प्रकार सीता मां को पृथ्वी माता ने शरण दी थी, उसी प्रकार राजकुमारी को भी पहाड़ के पत्थरों में एक दरार दिखाई दी, इन दरारों में ही राजकुमारी समा गईं। उसी राजकुमारी को मां रतनगढ़ वाली माता के रूप में पूजा जाता है। तभी से यह मंदिर अस्तित्व में आया। साथ ही उनका राजकुमार भाई कुंवर गंगा रामदेव भी आखिर में युद्ध में शहीद हो गया। इसके बाद इसी मंदिर में उनकी पूजा कुंवर बाबा के रूप में की जाने लगी।
Ratangarh Mata Temple: शिवाजी की निशानी है मंदिर
यह मंदिर छत्रपति शिवाजी महाराज की मुगलों के ऊपर विजय की निशानी है। मान्यता है कि 17वीं सदी में छत्रपति शिवाजी और मुगलों के बीच युद्ध हुआ था और रतनगढ़ वाली माता और कुंवर बाबा ने शिवाजी महाराज के गुरु रामदास को देव गढ़ के किले मे दर्शन दिए थे। शिवाजी महाराज को मुगलों से फिर से युद्ध के लिए प्रेरित किया था, फिर जब पूरे भारत पर राज करने वाले मुगल शासन की सेना वीर मराठा शिवाजी की सेना से टकराई, तो मुगलों को पूरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा। मुगल सेना को परास्त करने के बाद शिवाजी ने इस मंदिर को निर्माण कराया था।
