Murde Ki Sawari Rajasthan: राजस्थान में शीतला अष्ठमी धूमधाम से मनाई जाती है। यहां लोग होली पर नहीं शीतला अष्ठमी खेलते है। इस दिन एक अनोखी लोक परंपरा आज भी लोगों के बीच जीवित है, जिसे ‘मुर्दे की सवारी’ कहा जाता है। इस परंपरा में जिंदा व्यक्ति की अंतिम यात्रा निकाली जाती है।
‘मुर्दे की सवारी’
खास बात यह है कि इस आयोजन के दौरान लोग पूरे साल की भड़ास और नाराजगी मजाकिया अंदाज में एक दूसरे पर निकालते है। इसमें सामाजिक व्यंग्य, हास्य और लोक संस्कृति की झलक दिखाई देती है। बड़ी संख्या में लोग इस जुलूस में शामिल होते है, और माहौल उत्सव जैसा बन जाता है।

जिंदा व्यक्ति की शवयात्रा
भीलवाड़ा में होली के 8 दिन बाद शीतला अष्टमी पर सदियों पुरानी अनोखी परंपरा ‘मुर्दे की सवारी’ निकाली गई। इस दौरान एक शख्स को अर्थी पर लिटाकर ढोल-नगाड़ों के साथ शहर में शवयात्रा निकाली गई। जिसमें लोग गुलाल उड़ाते हुए हंसी-मजाक करते हुए शामिल हुए। इस अनोखी परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
अर्थी का दाह संस्कार
करीब 426 साल पुरानी इस परंपरा की शुरुआत चित्तौड़ वालों की हवेली से होती है। जुलूस शहर के मुख्य मार्गों, रेलवे स्टेशन चौराहा, गोलप्याऊ और भीमगंज क्षेत्र से होते हुए बड़े मंदिर पहुंचा। शव यात्रा के दौरान अर्थी पर लेटा व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया और ढोल की धुन पर नाचने लगा। बड़े मंदिर के पास पहुंचने पर अर्थी पर लेटा व्यक्ति उठकर भाग जाएगा और इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से अर्थी का दाह संस्कार किया जाएगा।

Murde Ki Sawari Rajasthan: क्या है परंपरा?
इस परंपरा के दौरान मजाक का दौर भी चलता है, इसलिए इसमें महिलाओं इसमें शामिल नहीं होती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक इस परंपरा को निभाने से समाज में आपसी मतभेद और कड़वाहट दूर होती है तथा सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यही कारण है कि हर साल शहरवासी उत्साह के साथ इस अनोखे आयोजन में भाग लेते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह सवारी होलिका के होने वाले पति इलोजी की याद में निकाली जाती है, जो होलिका की मृत्यु के बाद भी अविवाहित रहे।
