Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय की वह परिभाषा मान ली, जिसमें अरावली पहाड़ियों को सिर्फ भू-भाग माना गया है, जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से ज्यादा है। इसका मतलब है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा, जो 100 मीटर से कम है अब पहाड़ी नहीं माना जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस के अवसर पर गुरुवार को जयपुर में ग्रामीणों, नागरिक समाज समूहों, पर्यावरणविदों और शोधकर्ताओं ने ‘अरावली विरासत जन अभियान’ की शुरुआत की।
Rajasthan News: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध
यह पहल सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले के विरोध में है,जिसमें अरावली की नई परिभाषा तय की गई है। नई परिभाषा के अनुसार किसी भू-आकृति को तभी अरावली माना जाएगा जब उसकी ऊंचाई स्थानीय भूमि से कम से कम 100 मीटर अधिक हो। एफएसआई के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही इस मानक को पूरा करती हैं, जिससे अरावली का 90% हिस्सा संरक्षण से बाहर होकर खनन के लिए खुल सकता है।
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Rajasthan News: सांस्कृतिक पहचान आजीविका इसी पर निर्भर
सिरोही स्थित भाखर भित्रोत विकास मंच के लक्ष्मी और बाबू गरासिया ने कहा कि गरासिया जनजाति की सांस्कृतिक पहचान, आजीविका और जीवन निर्वाह सीधे तौर पर अरावली पहाड़ियों, जंगलों और इसके प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। ऐसे में अरावली का पूरी तरह से संरक्षण सुनिश्चत होना चाहिए।
अरावली हमारी लाइफलाइन
देश की सबसे पुरानी करीब 700 किमी. लंबी अरावली पर्वत शृंखला पर खनन को यदि नहीं रोका गया तो 90 प्रतिशत अरावली पर्वत शृंखला देखने को नहीं मिलेगी। इसके दुष्परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को भोगने पड़ेंगे।
अरावली की क्या अहमियत है?
ऊपरी अरावली : दिल्ली-एनसीआर और हरियाणा। दिल्ली का रायसीना हिल भी अरावली का हिस्सा था।
मध्य अरावली : दिल्ली से नीचे राजस्थान तक, उदयपुर क्षेत्र तक फैला हिस्सा।
निचला अरावली : गुजरात तक बढ़ने वाला हिस्सा।
पूरी अरावली का 80% राजस्थान में है। सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर (1,727 मीटर) माउंट आबू में है
