rajasthan high court: जोधपुर, राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम और भावनात्मक फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘परिवार’ शब्द का अर्थ केवल विधवा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मृत कर्मचारी के माता-पिता भी शामिल होते हैं। अदालत ने अजमेर डिस्कॉम को निर्देश दिया है कि मृत बेटे की जगह नौकरी पाने वाली बहू की सैलरी से उसके ससुर को हर महीने 20 हजार रुपए दिए जाएं।
rajasthan high court: मामला क्या है
यह मामला अलवर जिले के खेरली कस्बे का है। यहां बिजली विभाग (अजमेर डिस्कॉम) में कार्यरत एक कर्मचारी की मौत हो गई थी। उसकी मृत्यु के बाद विभाग ने अनुकंपा नियुक्ति के तहत उसकी बहू को नौकरी दी।
ससुर ने अदालत में याचिका दायर कर कहा कि वह पूरी तरह बेटे की आय पर निर्भर थे। बेटे की मौत के बाद उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है। अब जब बहू को बेटे की जगह नौकरी मिली है, तो उसे परिवार का हिस्सा मानते हुए उनके भरण-पोषण का जिम्मा भी उठाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने क्या कहा: rajasthan high court
जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा
“परिवार” शब्द का अर्थ सिर्फ मृत कर्मचारी की पत्नी या विधवा तक सीमित नहीं किया जा सकता।
कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से निर्भर सदस्यों की मदद करना है, न कि किसी को बाहर करना।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मृत कर्मचारी के माता-पिता भी परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं, और उन्हें अनुकंपा नियुक्ति से मिलने वाले लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
डिस्कॉम को दिया सीधा आदेश: rajasthan high court
अदालत ने अजमेर डिस्कॉम को आदेश दिया कि वह हर महीने बहू की सैलरी में से 20 हजार रुपए उसके ससुर के खाते में ट्रांसफर करे। यह राशि बहू की मासिक आय का हिस्सा मानी जाएगी और विभाग इसे वेतन से सीधे काटेगा। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश न केवल इस परिवार के लिए राहत का कारण बनेगा, बल्कि आने वाले समान मामलों में एक नज़ीर (precedent) के रूप में भी देखा जाएगा।
‘परिवार’ की परिभाषा पर नई दृष्टि: rajasthan high court
यह फैसला भारतीय समाज और कानून दोनों के लिए एक नई सोच लेकर आया है। अक्सर अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में बहू को नौकरी तो मिल जाती है, लेकिन बुजुर्ग माता-पिता आर्थिक रूप से उपेक्षित रह जाते हैं। हाईकोर्ट का यह कहना कि “परिवार शब्द का अर्थ सीमित नहीं है” सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय आने वाले समय में परिवारिक जिम्मेदारी और नैतिक कर्तव्य की नई परिभाषा तय करेगा।
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