जय श्रीराम बनाम अल्लाह हू अकबर- जालंधर में नारेबाज़ी से उठी आग

हिंदू संगठनों ने दी सड़कों पर उतरने की चेतावनी
mohammad controversy aap leader fir: पंजाब का जालंधर शहर शुक्रवार शाम एक छोटी सी घटना के बाद धार्मिक तनाव का मैदान बन गया — नारे वही थे जो दशकों से सुने जा रहे हैं, लेकिन परिस्थितियां और राजनीतिक संदर्भ ने उन्हें विस्फोटक बना दिया।
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एक तरफ “अल्लाह हू अकबर” की आवाज़ थी, दूसरी तरफ प्रतिक्रिया में गूंजा “जय श्रीराम”। दोनों ही नारे किसी के लिए आस्था का प्रतीक हैं, लेकिन जब सड़क पर आमने-सामने आए, तो सांप्रदायिक तनाव का रंग ले बैठे।
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नारेबाज़ी से शुरू हुआ सब कुछ
पोस्ट ऑफिस के पास शुक्रवार शाम ऑल इंडिया उलेमा का समूह ज्ञापन देने जा रहा था। तभी एक युवक योगेश ने “जय श्रीराम” का नारा लगाया। इसके तुरंत बाद मुस्लिम युवकों ने उसकी स्कूटी रोक ली, चाबी छीनी और कथित तौर पर धमकी दी।
वीडियो वायरल और पुलिस की चुप्पी
घटनाक्रम का वीडियो वायरल होते ही बजरंग दल और शिवसेना जैसे संगठन पीड़ित के समर्थन में थाने पहुंचे। पुलिस का जवाब था — “योगेश FIR नहीं करवाना चाहता”। यहीं से गुस्सा भड़क गया।
सीधे पुलिस कमिश्नर ऑफिस का घेराव
CP ऑफिस के बाहर हिंदू संगठनों ने धरना दिया, तो वहीं मुस्लिम पक्ष ने अपनी सफाई दी। कहासुनी बढ़ी, लेकिन पुलिस ने बीच-बचाव करते हुए स्कूटी की चाबी वापस दिलवा दी।
FIR और सियासी पृष्ठभूमि ने दिया नया मोड़
मामले में अब AAP नेता आयूब खान, नमीन खान सहित चार लोगों पर FIR हो चुकी है। खास बात ये है कि आयूब कभी भाजपा में था, फिर अकाली दल और कांग्रेस में रहा। उसकी पत्नी मौजूदा पार्षद हैं।
सिर्फ नारे नहीं, राजनीतिक समीकरण भी तड़का मार रहे हैं
आयूब खान की राजनीतिक यात्रा अपने आप में विवादों का पुलिंदा बन चुकी है — कांग्रेस से अकाली दल, फिर भाजपा और अब AAP। जिस BJP ने उन्हें मुस्लिम विंग का इंचार्ज बनाया, वही अब FIR मांग रही है।
AAP सरकार के लिए यह परेशानी का सबब बन सकता है, क्योंकि जिस नेता पर FIR हुई है, वो उन्हीं की पार्टी से जुड़ा है। और 2024 के चुनावों के ठीक पहले सांप्रदायिक माहौल की गर्माहट सरकार को झुलसा सकती है।
हिंदू संगठनों का अल्टीमेटम: 11 बजे श्रीराम चौक पर जुटेंगे
बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन अब शनिवार सुबह 11 बजे श्रीराम चौक पर जुटने की बात कह रहे हैं। उनका सीधा कहना है —
“अगर आरोपी नहीं पकड़े गए, तो हम सड़कों पर उतरेंगे।”
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हालांकि मुस्लिम पक्ष के चेयरमैन अकबर अली ने सफाई दी है कि
“कोई मारपीट या धमकी नहीं हुई। चाबी लौटा दी गई थी। ये सब राजनीतिक हवा बनाई जा रही है।”

क्या यह वाकई आस्था की लड़ाई है, या नेताओं की पुरानी चालें फिर से खेली जा रही हैं?
हर बार जैसे ही चुनावी साल करीब आता है, धार्मिक भावनाएं भड़कती हैं, और भीड़ से राजनीति की रोटियां सेंकी जाती हैं। कभी नारे की टाइमिंग पर विवाद होता है, तो कभी वीडियो के एंगल पर। पर असल सवाल यह है क्या आम आदमी की सोच अब भी इतनी कमजोर है कि वो इन नारों पर अपना संयम खो दे?
