बचपन पानी में डूबा नहीं… उम्मीदों में तैरा
शायद ही किसी ने सोचा होगा कि जिस स्कूल को हम ‘दूसरा घर’ मानते हैं, वो एक दिन बाढ़ में घिरकर खुद मदद की गुहार लगाएगा।
गुरदासपुर, पंजाब का एक शांत-सा कस्बा, जहां हर सुबह बच्चों की किलकारियों से स्कूलों का आंगन गूंजता था, आज वहीं नवोदय विद्यालय डबूरी में 400 से ज्यादा बच्चे और शिक्षक एक-एक सांस के लिए ऊपर की ओर देख रहे हैं। नीचे 5 फीट तक पानी, और ऊपर आसमान से उम्मीदें।

जब सुबह-सुबह पानी का स्तर बढ़ा, तो किसी ने नहीं सोचा था कि ये बाढ़ स्कूल की दीवारों को भी निगल लेगी। प्रधानाचार्य नरेश कुमार ने प्रशासन को कॉल किया, बच्चे डरे हुए हैं… जल्दी कुछ कीजिए। फिर शुरू हुआ इंतजार रेस्क्यू टीमों का, नावों का, और उन चेहरों पर लौटने वाली मुस्कान का।
सेना के हेलिकॉप्टर से रेस्क्यू
सेना का हेलिकॉप्टर आसमान में मंडराने लगा। नीचे बच्चे अपने-अपने बैग थामे, शायद ये सोचते हुए कि किताबें अब कीचड़ से बचेंगी या नहीं।एक बच्ची, जो शायद दस साल की रही होगी, अपनी फ्रॉक में भीगती हुई रो रही थी। टीचर ने उसे गले लगाते हुए कहा, “कुछ नहीं होगा बेटा, देखो आर्मी आ गई। ये सिर्फ राहत कार्य नहीं था ये भरोसे की डोर थी, जो हर नागरिक के दिल में बंधी हुई है जब संकट आता है।
पंजाब ही नहीं, पूरा उत्तर भारत जल संकट में
पठानकोट, फिरोजपुर, तरनतारन हर तरफ हालात बिगड़ते जा रहे हैं। करतारपुर साहिब कॉरिडोर जहां से लोग श्रद्धा से गुजरते हैं, आज 7 फीट पानी में डूबा है। गुरुद्वारा साहिब पाकिस्तान की ओर पानी में समाया हुआ है।
कटरा के वैष्णो देवी ट्रैक पर लैंडस्लाइड में 32 लोग जान गंवा चुके हैं। राजस्थान में गूगल मैप के भरोसे नदी पार करने की कोशिश में एक परिवार की वैन बह गई। हिमाचल में घर बहे, चंबा में इंटरनेट बंद… लगता है जैसे पूरा उत्तर भारत एक दर्द की लहर से गुजर रहा है।
संकट के समय हम क्या करते हैं?
बाढ़ सिर्फ पानी नहीं लाती वो लाती है इंसान की असली तस्वीर सामने। गांव के लोग, जिनके खुद के घर डूबे हैं, स्कूल की ओर खाना लेकर पहुंचे “बच्चों को भूखा मत रखना।” एक बूढ़े बाबा ने NDRF टीम को रोक कर कहा, “बचाओ पहले मास्टर जी को, वो ही इन बच्चों की जान हैं। और यही है भारत जहां आपदा आती है, तो इंसानियत हथियार बन जाती है।

सवाल ये है कि हमने क्या सीखा?
क्या हमारे स्कूल बाढ़ के लिए तैयार हैं?
क्या हमारे बच्चे इतनी आपदा झेलने लायक मनोबल रखते हैं?
क्या हमारा इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ दिखावे के लिए मजबूत है, या असल में संकट झेल सकता है? ये सवाल सिर्फ प्रशासन के लिए नहीं, हमारे लिए भी हैं माता-पिता, शिक्षक, और एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर।
एक उम्मीद की कहानी जो हमें जागरूक बनाती है
गुरदासपुर के बच्चे आज सुरक्षित हैं। सेना, NDRF, स्थानीय प्रशासन और आम लोगों की एकजुटता ने उन्हें बचाया। लेकिन ये कहानी सिर्फ राहत की नहीं, चेतावनी की भी है। बारिश तो फिर होगी… बाढ़ भी आ सकती है… पर क्या हम फिर बच्चों को इसी हाल में छोड़ देंगे?
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