religious sites liquor protest : उत्तराखण्ड के धार्मिक स्थलों के पास शराब के ठेकों के खिलाफ स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। इस आंदोलन में लोग शराब के ठेकों पर ताले लगाकर बंद कराने की मांग कर रहे हैं। तीर्थनगरी ऋषिकेश, हर की पौड़ी, और बद्रीनाथ जैसे पवित्र स्थानों पर शराब बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने की जिद लगातार बढ़ रही है। लोगों का मानना है कि शराब की दुकानों के कारण धार्मिक स्थल की पवित्रता और सामाजिक अनुशासन बिगड़ रहा है।
सरकार की नई आबकारी नीति और विरोध
उत्तराखंड सरकार ने धार्मिक क्षेत्रों के आसपास शराब की दुकानों का लाइसेंस रद्द करने की नई आबकारी नीति लागू की है, लेकिन इसके बावजूद कई जगह शराब की दुकाने खुली हुई हैं। इस नीति के तहत उपदुकानों और मेट्रो मदिरा बिक्री प्रणाली को समाप्त किया गया है, साथ ही यदि कोई दुकान एमआरपी से अधिक मूल्य वसूलती है, तो उसका लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। हालांकि, प्रशासनिक लापरवाही के कारण कई इलाकों में यह नियम सही तरीके से लागू नहीं हो पा रहा है। इस पर लोग और सामाजिक संगठन बढ़ती नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं।
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जुलूस और प्रदर्शन
इसी के साथ धार्मिक स्थलों पर विरोध प्रदर्शन का स्वरूप जुलूस जैसा भी हो गया है, जहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु सरकार से कड़ा कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। इस जुलूस के माध्यम से वे जनता और प्रशासन दोनों को संदेश दे रहे हैं कि तीर्थस्थलों पर शराब के ठेकों की जगह नहीं होनी चाहिए। आंदोलनकारी कहते हैं कि तीर्थनगरी को शराब मुक्त बनाकर उसकी शुद्धता, सांस्कृतिक गौरव और धार्मिक गरिमा को बनाए रखना चाहिए।
सामाजिक और धार्मिक महत्व
उत्तराखण्ड की तीर्थनगरी को ‘देवभूमि’ के नाम से जाना जाता है, जहां देवी-देवताओं की आस्था गहरी है। यहां शराब की दुकानों का बढ़ना समाज में नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, खासकर युवाओं पर। स्थानीय साधुओं, संतों और समाजसेवी संगठनों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है और प्रशासनिक अधिकारियों से आग्रह किया है कि वह इस नीति को प्रभावी रूप से लागू करें जिससे पारंपरिक और धार्मिक माहौल को संरक्षित किया जा सके।
जनमानस की मांग है कि जल्द से जल्द तीर्थस्थलों के आसपास शराब की दुकानों को बंद कर एक शुद्ध और पवित्र माहौल सुनिश्चित किया जाए, ताकि उत्तराखंड की ‘देवभूमि’ की धार्मिक गरिमा बनी रहे।
