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🏛️ राष्ट्रपति बनाम सर्वोच्च न्यायालय : एक संवैधानिक टकराव?

Shital Sharma May 15, 2025

president murmu vs supreme court : क्या अदालत तय कर सकती है राष्ट्रपति की सीमाएं?  

president murmu vs supreme court : 2025 में भारत की संवैधानिक बहस उस मोड़ पर है, जहाँ देश की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से सीधे सवाल पूछे हैं – और वो भी 14 एक साथ।

🤔 क्या है पूरा मामला?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों को राज्यपाल ने मंजूरी देने से रोका। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और 8 अप्रैल, 2025 को कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा कि राज्यपालों के पास वीटो पावर नहीं है और राष्ट्रपति को बिल मिलने के तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।

11 अप्रैल को आए विस्तृत आदेश में राष्ट्रपति को भी समय सीमा में निर्णय देने का निर्देश दिया गया।

 राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे

राष्ट्रपति मुर्मू का मुख्य तर्क है कि अगर संविधान में कहीं भी समय सीमा का उल्लेख नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट ऐसा निर्देश कैसे दे सकता है?

उनके सवालों में प्रमुख मुद्दे हैं:

  • राज्यपाल/राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियाँ क्या हैं?
  • क्या राष्ट्रपति/राज्यपाल कोर्ट के आदेशों के अधीन हैं?
  • क्या समय सीमा तय करना न्यायिक अतिक्रमण है?
  • क्या अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति को पूर्ण कानूनी सुरक्षा देता है?

🔽 नीचे कुछ प्रमुख सवाल

  1. क्या राज्यपाल को मंत्रीपरिषद की सलाह माननी होती है?
  2. क्या राष्ट्रपति के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा संभव है?
  3. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति के निर्णय बदल सकता है?
  4. क्या राष्ट्रपति को कोर्ट से राय लेना जरूरी है?

⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

🔹 1. निर्णय अनिवार्य है:

राष्ट्रपति बिल पर 3 महीने में निर्णय लें — यह बाध्यकारी होगा।

🔹 2. न्यायिक समीक्षा संभव:

अनुच्छेद 201 के तहत राष्ट्रपति का निर्णय मनमाना या असंवैधानिक होने पर कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।

🔹 3. देरी पर कारण देना होगा:

अगर समय पर निर्णय नहीं लिया गया तो देरी के पीछे कारण देना होगा।

🔹 4. बार-बार बिल लौटाना नहीं चलेगा

राष्ट्रपति केवल एक बार बिल वापस भेज सकते हैं। दोबारा पास होने पर निर्णय अनिवार्य होगा।

🔍 क्यों है यह मुद्दा महत्वपूर्ण?

यह सवाल भारत के संवैधानिक ढांचे, शक्ति विभाजन और न्यायिक समीक्षा की सीमाओं से जुड़ा है। यह पहली बार है जब राष्ट्रपति ने इतने सीधे सवाल न्यायपालिका से पूछे हैं — और इससे भविष्य में केंद्र-राज्य संबंधों, गवर्नर की भूमिका और राष्ट्रपति की कार्यप्रणाली पर असर पड़ेगा।

📌  जवाब भारत के भविष्य की दिशा तय करेगा

क्या सुप्रीम कोर्ट की समय सीमा तय करने की शक्ति है? क्या राष्ट्रपति और राज्यपालों को भी न्यायिक दायरे में लाया जा सकता है?

ये सवाल सिर्फ संवैधानिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र की व्याख्या से भी जुड़े हैं — और इनका जवाब भारत के भविष्य की दिशा तय करेगा।

Raed More:-राष्ट्रपति बनाम सर्वोच्च न्यायालय: एक संवैधानिक टकराव?

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