भारत में वंशवाद और आपराधिक राजनीति का बढ़ता प्रभाव

राजनीति में वंशवाद: क्या भारतीय लोकतंत्र पर इसका गहरा असर हो रहा है?
political family dynasty india: क्या आप सोच सकते हैं कि आज भी हमारी राजनीति में वंशवाद का इतना प्रभाव है? ये सवाल आज हर नागरिक के दिमाग में गूंज रहा है। देश में 21% सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य राजनीतिक परिवारों से आते हैं। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर एक गंभीर सवाल है। क्या यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें नए और योग्य नेता अपने करियर को आगे बढ़ा नहीं पा रहे?
आइए, इसे समझते हैं।
राजनीति के इस अंधेरे पक्ष से जूझता भारत
हमारे देश में राजनीति अब सिर्फ एक विचारधारा और सेवा का माध्यम नहीं रह गई है। जब आप गहराई से सोचते हैं, तो यह एक ऐसा क्षेत्र बन चुका है जहां परिवार की विरासत को आगे बढ़ाना ज्यादा मायने रखता है। आज भी ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां नेता सिर्फ अपने परिवार के बल पर राजनीति में चमकते हैं, चाहे उनकी योग्यता हो या न हो। यही कारण है कि चुनावी हलफनामों में 32% कांग्रेस और 18% भाजपा के नेता राजनीतिक परिवारों से आते हैं।

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में तो लगभग 23% विधायक और सांसद इसी वंशवाद का हिस्सा हैं। क्या इसका मतलब यह नहीं कि नए और योग्य उम्मीदवारों को बाहर रखा जा रहा है? क्या हमारे नेताओं का असली काम सिर्फ परिवार की प्रतिष्ठा बचाना है, या फिर उन्हें देश की सेवा करनी चाहिए?
वंशवाद से लोकतंत्र को क्या नुकसान हो रहा है?
राजनीति में वंशवाद का असर सिर्फ यह नहीं कि योग्य उम्मीदवारों को मौका नहीं मिल रहा, बल्कि इससे भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी भी बढ़ रही है। ऐसे नेता जो पारिवारिक तंत्र के तहत राजनीति में आए होते हैं, वो कभी भी अपने काम में पारदर्शिता नहीं रखते। उनका ध्यान ज्यादा से ज्यादा सत्ता हथियाने और अपने परिवार के लिए लाभ अर्जित करने पर होता है। और जब सत्ता में बैठे लोग खुद पर अपराधों के आरोपों से घिरे होते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी होती है।
आज की रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि देश के 47% मंत्रियों पर आपराधिक केस हैं। इनमें से कई तो हत्या, अपहरण और महिला अपराध जैसे गंभीर मामलों में भी शामिल हैं। ऐसे में, क्या हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति अब सिर्फ एक परिवारिक धंधा बन चुकी है?
क्या इसे बदलने का कोई रास्ता है?
यह सवाल हर किसी के मन में उठता है। क्या हमें अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए इस वंशवाद से बाहर निकलने की जरूरत नहीं है? इसका सबसे बड़ा उपाय यही है कि हम राजनीति में योग्यता और ईमानदारी को प्राथमिकता दें। राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के चयन में पारदर्शिता बढ़ानी होगी। हमें ऐसे नेताओं की जरूरत है जो किसी राजनीतिक परिवार के बजाय अपनी मेहनत और काबिलियत से राजनीति में आए हों।

हमारे संविधान ने हमें लोकतंत्र दिया है, लेकिन क्या हम इसका सही तरीके से पालन कर पा रहे हैं? क्या वंशवाद और आपराधिक राजनीति ने इस लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को कमजोर कर दिया है?
