एक पल की ख़ामोशी… और संसद में गूंजा – सिंदूर
कभी-कभी राजनीति भी एक इमोशनल मैदान बन जाती है, जहां शब्द सिर्फ तर्क नहीं, भावनाएं भी होते हैं। और ऐसा ही एक दिन था जब संसद की दीवारों ने एक ऐसा भाषण सुना जिसने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया।
मानसून सत्र चल रहा था। बाहर बारिश हो रही थी, और भीतर… संसद में गरमागरम बहस। लेकिन जब पीएम मोदी बोले, तो कुछ देर के लिए सब कुछ रुक सा गया। उन्होंने कहा, “22 मिनट… सिर्फ 22 मिनट लगे थे उन्हें मिटाने में, जो सालों से देश की सीमाओं को लांघते आए थे।”
ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक मिशन नहीं, एक संदेश था
9 मई 2025 की उस सुबह को शायद ही कोई भूलेगा। जब TV स्क्रीन पर फ्लैश हुआ “1000 से अधिक पाकिस्तानी मिसाइल और ड्रोन गिराए गए”। शुरू में लगा जैसे ये कोई फिल्मी कहानी है। लेकिन नहीं, यह हकीकत थी।
पीएम मोदी ने संसद में बताया कि कैसे भारतीय वायुसेना ने मिनटों में वो कर दिखाया, जो दुनिया के कई देश करने से डरते हैं। उन्होंने कहा “इस बार किसी ने हमें रोका नहीं। न वॉशिंगटन से कोई कॉल आया, न न्यूयॉर्क से कोई नसीहत।” ये वाक्य जैसे देश की छाती पर गर्व से लिखा गया हो।
लेकिन हर कहानी के दो पहलू होते हैं…
विपक्ष ने ताली नहीं, सवाल उठाए
राहुल गांधी खड़े हुए। उनके लहजे में गुस्सा था, सवाल थे और शायद थोड़ा डर भी। उन्होंने पूछा “क्या हमारे पायलटों के हाथ बांध दिए गए थे?”
वो बोले कि सरकार ने देश की रक्षा से ज़्यादा अपनी इमेज की फिक्र की। कहीं न कहीं, ये बात अटपटी भी लगी और जरूरी भी। जब देश में हजारों किलोमीटर दूर कोई ऑपरेशन होता है, क्या देशवासियों को सबकुछ पता होता है? क्या पारदर्शिता सिर्फ एक पक्ष की जिम्मेदारी नहीं?
प्रियंका गांधी ने एक और बात छेड़ दी “जब पहलगाम में हमला हुआ, तो ज़िम्मेदारी कौन लेता है?”
सत्ता और विपक्ष दोनों अपने-अपने सच लेकर खड़े थे
एक तरफ मोदी सरकार अपनी सैन्य सफलता और निर्णायक नेतृत्व की बात कर रही थी। दूसरी तरफ विपक्ष पूछ रहा था “इतने बड़े ऑपरेशन पर संसद को क्यों अंधेरे में रखा गया?”
खड़गे साहब ने सीधा सवाल दागा “अगर सब कुछ इतना पारदर्शी था, तो विपक्ष को पहले क्यों नहीं बताया?”
जवाब आया “देश की सुरक्षा पहले, राजनीति बाद में।”
लेकिन हम जैसे आम लोग जो सिर्फ खबरें पढ़ते हैं, TV डिबेट नहीं, सच्चाई के करीब जाना चाहते हैं… हमें किस पर भरोसा करना चाहिए?
ये सिर्फ राजनीति नहीं है
ऑपरेशन सिंदूर अब सिर्फ एक सैन्य मिशन नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन गया है। शक्ति का, नेतृत्व का, और साथ ही सवालों का। हमेशा की तरह, सत्ता जवाब देती है, और विपक्ष सवाल उठाता है। लेकिन इस बार फर्क ये था कि दोनों पक्षों में कहीं न कहीं भावनाएं झलक रही थीं। और हम जनता उनकी बातों को सुनते हुए अपने भरोसे का रास्ता तलाशते हैं।
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