इमरान खान की पार्टी सड़क पर उतरने को तैयार

pakistan supreme court: इस्लामाबाद इन दिनों बेचैनी की जमीन पर खड़ा है। एक तरफ देश की कमजोर अर्थव्यवस्था पहले ही लोगों को थका चुकी है, दूसरी तरफ अब न्यायपालिका और सेना के बीच टकराव खुलकर सामने आने लगा है। पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के दो सीनियर जजों—मंसूर अली शाह और अतहर मिनल्लाह—ने इस्तीफा देकर एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जिसने पूरे सिस्टम की नसें हिला दी हैं।
दोनों जजों ने अपने इस्तीफे में साफ कहा कि 27वां संविधान संशोधन लोकतंत्र की जड़ें हिलाने वाला कदम है। यह संशोधन आर्मी चीफ आसिम मुनीर को न केवल तीनों सेनाओं का डिफेंस चीफ बनाता है, बल्कि उन्हें किसी भी कानूनी कार्रवाई से लगभग छूट भी दे देता है। पाकिस्तान में पहले भी सेना की ताकत चर्चा का विषय रही है, लेकिन इस बार मामला अदालत की दीवारों तक टकरा गया है।
जजों का इस्तीफा: सिर्फ विरोध या किसी बड़े भूचाल का संकेत?
सुप्रीम कोर्ट पहले से खाली पदों के बोझ से दबा हुआ है। कुल 25 जजों के स्थान पर अब सिर्फ 14 जज ही कार्यरत हैं। ऐसे में दो वरिष्ठ जजों के इस्तीफे का असर सिर्फ संवैधानिक ढांचे तक सीमित नहीं रहेगा। अदालत के भीतर यह माहौल बन रहा है कि संशोधन के जरिए न्यायपालिका की शक्तियों को राष्ट्रपति और सेना के प्रभाव के नीचे धकेला जा रहा है।
सूत्र बता रहे हैं कि दो से तीन और जज भी इस्तीफा देने पर विचार कर रहे हैं। यदि ऐसा हुआ तो सुप्रीम कोर्ट का अपना अस्तित्व ही दांव पर लग जाएगा। पाकिस्तान की राजनीति में ऐसा टकराव किसी भी दौर में हल्का नहीं रहा। इतिहास गवाह है कि न्यायपालिका और सेना का संघर्ष अक्सर राजनीतिक भूचाल लाता है।
इमरान खान की पार्टी एक्शन में, बड़ा आंदोलन उभरने की सुगबुगाहट
इस घटनाक्रम ने PTI को भी नए सिरे से ऊर्जा दे दी है। इमरान खान भले जेल में हों, लेकिन उनकी पार्टी खुलकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। PTI की संसदीय समिति ने पूरे देश में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शनों का सुझाव दिया है।
पार्टी का रुख साफ है—अगर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज इस संशोधन को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं, तो जनता को भी चुप नहीं रहना चाहिए। समिति ने जजों के इस्तीफे को “संवैधानिक मूल्यों की रक्षा” बताया है और न्यायपालिका से एकजुट होकर इस संशोधन के खिलाफ खड़े होने की अपील की है।
गुरुवार को विपक्षी गठबंधन TTAP की बैठक में भी हालात को लेकर गहरी चिंता जताई गई। बैठक के बाद पूर्व स्पीकर असद कैसर ने कहा कि देश ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां शासन कमजोर, अर्थव्यवस्था कगार पर और कानून-व्यवस्था गिरती हुई दिख रही है। उन्होंने दावा किया कि दो जजों का इस्तीफा “पहली बारिश की बूंद” है अगले दिनों में बड़ा तूफान उठ सकता है।
देश की सड़कें किस ओर जाएंगी?
पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक संकट से गुजर रहा है। महंगाई का दबाव, बेरोजगारी की मार और राजनीतिक अस्थिरता की आग—इन सबके बीच अब न्यायपालिका का खुला विद्रोह हालात को और नाजुक बना रहा है। आम नागरिक जानना चाहता है कि क्या यह लड़ाई सत्ता के गलियारों में सीमित रहेगी या सड़कों पर फैलकर देश को एक और राजनीतिक तूफान में झोंक देगी।
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