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भारत में मोटापे का उभरता संकट: बच्‍चों से लेकर वयस्‍कों तक

Shital Sharma October 27, 2025

obesity-spike-india-children-adults

obesity spike india children adult: हाल ही में UNICEF की रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि भारत में एक नया स्वास्थ्य-चुनौती उभर रही है। पिछले वर्षों में जब हम मुख्यतः कुपोषण, कद-काठी में कमी और कुपोषण से जुड़ी बीमारियों पर चर्चा करते थे, अब मोटापा बच्चों और वयस्कों में तेजी से बढ़ने लगा है। यह बदलाव सिर्फ एक व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्या नहीं है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, नीति-निर्माण और सामाजिक जीवनशैली से जुड़ा विषय बन गया है।

यह लेख देखाएगा कि…

  • यह बदलाव क्यों हुआ है,
  • इसके पीछे मुख्य तथ्य क्या हैं,
  • विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं,
  • और आगे क्या संभावनाएं नजर आ रही हैं।

UNICEF की वैश्विक बाल पोषण रिपोर्ट-2025 के अनुसार, भारत में स्कूल-उम्र के बच्चों और किशोरों में मोटापा (overweight/obesity) अब सबसे अधिक देखने वाला कुपोषण रूप बन गया है। इसका मतलब यह है कि अब बच्चों के बीच कम वजन-घाटा जो कई दशकों से चिंता का विषय था उसकी तुलना में मोटापा अधिक सामना करने योग्य समस्या बन चुका है।

मोटापे के बढ़ते स्तर का कारण कई हैं:

  • बदलती आहार-प्रवृत्तियाँ,
  • शहरी जीवनशैली,
  • बैठने-वाले काम,
  • तथा फिजिकल एक्टिविटी में कमी।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि यह केवल भोजन की मात्रा का मुद्दा नहीं बल्कि पर्यावरण-सामाजिक कारकों से जुड़ा है।

तकनीकी जानकारी और विश्लेषण

मोटापा तब उत्पन्न होता है जब ऊर्जा (खाना) की मात्रा और व्यय (शारीरिक गतिविधि) के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। बच्चों में पुराने जमाने की तुलना में अब अधिक कैलोरी-युक्त, प्रसंस्कृत भोजन उपलब्ध है। इसके साथ-साथ

  • स्क्रीन-समय बढ़ा है,
  • स्कूलों में शारीरिक शिक्षा का समय घटा है
  • और खुले मैदानों की संख्या कम हुई है।
  • शहरी क्षेत्रों में पार्क-वेटिंग की जगह मॉल-सिनेमा-गेमिंग सेंटरों ने ले ली है।

इस तरह,

“बैठे रहना” जीवनशैली का हिस्सा बन गया है। नतीजतन, शरीर में वसा संचय बढ़ने लगा है। नीति-विश्लेषकों का कहना है कि भारत जैसे देश में जहाँ स्वास्थ्य-संसाधन पहले ही दबाव में हैं, मोटापे से जुड़ी बीमारियों (जैसे डायबिटीज़, उच्च रक्तचाप, और हृदय रोग) आने वाले समय में बड़ी समस्या बन सकती हैं।

विशेषज्ञ की राय

स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ Dr. R. K. Singh के अनुसार,

“मोटापा सिर्फ व्यक्तिगत समस्या नहीं है यह सामाजिक-पर्यावरणीय समस्या है। जब बच्चों को सक्रिय खेल के लिए समय नहीं मिलता और उनका आहार ऐसे विकल्पों से भर जाता जो कैलोरी तो ऊपर ले जाते हैं लेकिन पोषण कम देते हैं, तो परिणामस्वरूप मोटापा बढ़ना तय है।” उनका यह भी कहना है कि स्कूल-स्तर पर ‘सक्रिय ब्रेक्स’, स्नैक-पॉलिसी, और माता-पिता को जागरूक करना महत्वपूर्ण है। इसके बिना केवल चिकित्सकीय हस्तक्षेप पर्याप्त नहीं होंगे।

राजनीतिक और सार्वजनिक प्रतिक्रिया

सरकार ने हाल-फिलहाल इस समस्या को पहचानना शुरू किया है। शिक्षा मंत्रालय ने स्कूलों में खेल-कूद और योग को बढ़ावा देने का संकेत दिया है। राज्य-स्तर पर भी “स्वस्थ स्कूल” पहलें सामने आई हैं। सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पर भी मोटापे-विरोधी अभियान वायरल हो रहे हैं।

उदाहरण के लिए,

हेल्थ-इन्फ्लुएंसर छोटे-छोटे वीडियो बना कर बच्चों को सक्रिय रहने और जंक फ़ूड कम खाने की प्रेरणा दे रहे हैं। हालाँकि आलोचक यह भी कह रहे हैं कि भोजन उद्योग और विज्ञापन नियमों में सुधार अभी बहुत देर से हो रहा है। प्रसंस्कृत और चीनी-युक्त उत्पाद अभी भी सस्ते विकल्पों में उपलब्ध हैं, जो समस्या को और बढ़ावा देते हैं।

ऐतिहासिक संदर्भ

भारत ने दशकों तक मुख्यतः

  • कुपोषण,
  • कद-काठी कम होना,
  • स्टंटिंग (बद्ध विकास)

जैसी चुनौतियों का सामना किया है। अब मोटापा इन चुनौतियों के खिलाफ एक नया मोर्चा है। UNICEF रिपोर्ट में कहा गया है कि…

यह “ब्रिकेटेड कुपोषण” का उदाहरण है जहाँ कम वजन के साथ-साथ अधिक वजन दोनों मौजूद हैं। यह परिवर्तन वैश्विक पैटर्न का हिस्सा भी है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पहले से मोटापे की समस्या थी और अब विकासशील देशों में भी यह तेजी से बढ़ रही है। भारत की आर्थिक-शहरीकरण की गति, खाने-पीने की शैली में बदलाव, और जनसंख्या-घनत्व के कारण यह समस्या विशेष रूप से गंभीर होती जा रही है।

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Shital Sharma

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i am contant writer last 10 Years, worked with Vision world news channel, Sadhna News, Bharat Samachar and many web portals.

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