एक मां, एक बेटी, एक नर्स… और मौत के साये में जिंदा रहना
उस शाम मेरी मां बहुत देर तक टीवी के सामने बैठी रहीं।
आंखें नम थीं। हाथों में प्रार्थना की माला और टीवी पर वो नाम निमिषा प्रिया।
“एक औरत, जो किसी देश में अकेली थी, मरने को छोड़ दी गई थी। लेकिन आज… उसे फिर से जीने का हक़ मिला।”
यमन में सालों से बंद एक भारतीय नर्स, जिसे फांसी दी जानी थी, अब ज़िंदा रह सकेगी। और यही खबर सिर्फ एक फैसले की नहीं बल्कि इंसानियत, इंसाफ और उम्मीद की जीत है।
किस्सा सिर्फ कानून का नहीं, दर्द का भी है
2017 से जेल में बंद निमिषा प्रिया, एक नर्स, एक मां जिसने जिंदगी में सिर्फ दूसरों की मदद करना सीखा था। पर जब यमन में एक नागरिक की मौत हुई, और उस पर हत्या का आरोप लगा, तो उसकी जिंदगी पल भर में बदल गई।
मामला सीधा नहीं था। जिस शख्स की मौत हुई, वह तलाल महदी था उसी क्लिनिक का साझेदार, जिसने निमिषा का पासपोर्ट छीन लिया था, उसे प्रताड़ित किया, और उसके साथ हिंसा की।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, निमिषा ने कई बार पुलिस में शिकायत की, लेकिन हर बार उसे ही दोषी ठहरा दिया गया। महदी ने एडिटेड तस्वीरें दिखाकर खुद को उसका पति साबित किया, और फिर वो न्याय का खेल उसके खिलाफ मोड़ दिया गया।
जून 2018 में निमिषा को हत्या का दोषी ठहराया गया।
सजा: मौत। तारीख: 16 जुलाई 2025।
लेकिन इससे एक दिन पहले, 15 जुलाई को एक चमत्कार हुआ। भारतीय ग्रैंड मुफ्ती कांथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार और यमन के सूफी धर्मगुरु शेख हबीब उमर बिन हाफिज के बीच हुई एक खास बातचीत में इस सजा को अस्थाई रूप से रोक दिया गया।
बातचीत नहीं, यह उम्मीद की आखिरी डोर थी
यह पहली बार था कि मृतक के परिवार का कोई करीबी सदस्य उसका भाई अब्देल फत्तह बात करने को तैयार हुआ। शरिया कानून के तहत, “ब्लड मनी” यानी मुआवजे के बदले माफ़ी का विकल्प दिया जा सकता था। भारत की तरफ से 10 लाख डॉलर (लगभग 8.5 करोड़ रुपये) की पेशकश हुई, लेकिन फत्तह ने साफ कहा:
“ये हमारी इज्जत का सवाल है। हम माफ नहीं करेंगे, ना ही पैसा लेंगे।”
उसका गुस्सा भी समझ आता है भाई की हत्या, सालों का कोर्ट केस, और तबाही की टीस। पर एक इंसान की जान बचाना भी किसी लड़ाई से कम नहीं होता।
आखिरकार, 29 जुलाई की रात आई और सजा रद्द कर दी गई
रात को ग्रैंड मुफ्ती के ऑफिस से बयान आया कि निमिषा प्रिया की सजा रद्द कर दी गई है। हालांकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसकी पुष्टि नहीं की, पर ये खबर खुद एक राहत की सांस जैसी थी।
भारत सरकार इस मामले में सीमित थी यमन में दूतावास नहीं, वार्ता सऊदी अरब के रियाद स्थित दूतावास के जरिए हो रही थी। 2015 में यमन का भारतीय मिशन बंद हो चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि भारत इस मसले में सिर्फ “एक सीमा” तक ही दखल दे सकता है। तब जाकर ये मामला पूरी तरह लोगों के हाथ में आया सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल काउंसिल, धर्मगुरु, और आम भारतीयों की दुआओं ने इस कहानी को नया मोड़ दिया।
मौत के साए से बाहर आई एक ज़िंदगी
निमिषा की कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं है। ये उन हजारों भारतीयों की कहानी है जो विदेशों में काम करते हैं, बिना सुरक्षा, बिना सिस्टम।
और ये याद दिलाती है कि एक इंसान के लिए आवाज उठाना, एक पूरी व्यवस्था को हिला सकता है। आज निमिषा ज़िंदा है और शायद कल उसकी बेटी अपनी मां को गले लगा सके।
ये न्याय की जीत है।
ये इंसानियत की जीत है।
और सबसे बड़ी बात ये उम्मीद की जीत है।
Read More:- इंडिगो फ्लाइटः युवक को आया पैनिक अटैक, यात्री ने जड़ दिया थप्पड़
Watch Now :-कुल्लू जिले में लगातार बारिश और अचानक आई बाढ़
