नेपाल हिंसा में 51 मौतें, एक भारतीय महिला भी शामिल

नेपाल की सड़कों पर खून बह रहा है और इंसाफ चुप है
वो देश जिसे हम शांत, सुंदर और भगवान बुद्ध की धरती मानते हैं — आज वही देश अपनी ही जनता के खून से लाल है। बीते कुछ दिनों से यहां जो हो रहा है, उसने मानवता को एक बार फिर सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।
51 जिंदगियां जा चुकी हैं। इनमें एक भारतीय महिला — गाजियाबाद की रहने वाली राजेश गोला — भी शामिल हैं, जो सिर्फ छुट्टियां मनाने गई थीं। लेकिन कौन जानता था कि वह होटल, जहां वे ठहरी थीं, उपद्रवियों की आग में झुलस जाएगा और उनकी जिंदगी की आख़िरी चीखें दीवारों में दब जाएंगी?
राजनीति, विरोध और आग में झुलसती उम्मीदें
केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद देश की सियासत हवा में झूल रही है। देश की जनता, खासकर Gen-Z युवा, सड़कों पर उतर आए हैं। वे संविधान, नेतृत्व और न्याय की मांग कर रहे हैं — लेकिन जवाब में उन्हें मिल रही है सिर्फ गोलियां, लाठियां और कर्फ्यू।
सुशीला कार्की, जो नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस रह चुकी हैं, अब अंतरिम प्रधानमंत्री बनने के करीब हैं। लेकिन यह भी एक टेढ़ी राह है। संसद को भंग करना होगा, तभी कार्की को संवैधानिक रूप से चुना जा सकता है। पर राष्ट्रपति पौडेल अब भी दुविधा में हैं।
भारत के नागरिकों में डर, अपनों की चिंता में डूबी आंखें
भारत ने अपने नागरिकों को निकालना शुरू कर दिया है। आंध्र प्रदेश से लेकर दिल्ली तक लोग वापस आ रहे हैं। लेकिन कई अब भी फंसे हैं — जैसे अयोध्या के 8 तीर्थयात्री या दिल्ली की उपासना गिल, जिन्हें वॉलीबॉल इवेंट से रेस्क्यू किया गया।
कई बॉर्डर सील हो चुके हैं। गयाजी में रुके हज़ारों यात्री अब नेपाल लौटने से कतरा रहे हैं। नेपाल में कारोबार 50% गिर चुका है, ज़रूरी सामान महंगे हो रहे हैं, और अफवाहें सोशल मीडिया पर आग में घी डाल रही हैं।
अब ज़रूरत है संवेदनशीलता की, समाधान की, और साहस की
नेपाल सिर्फ एक और देश नहीं है वह भारत का पड़ोसी, भाई और सांस्कृतिक साथी है। वहां का हर दर्द हमारी आत्मा तक पहुंचता है। आज जब वह संकट में है, तो हमें भी उसकी आवाज़ बनना होगा।
राजनीतिक नेताओं को सत्ता की कुर्सी से ज़्यादा इंसानी जान की कीमत समझनी होगी। और जनता को — खासकर युवा पीढ़ी को — चाहिए कि वह अपनी ऊर्जा को जलाने की बजाय, उसे एक नई दिशा में बहने दे।
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