नेपाल की सच्चाई जिसे सबने नजरअंदाज किया…
कभी हिमालय की गोद में बसा शांत नेपाल आज आग की लपटों में घिरा है। काठमांडू की सड़कों पर गोलियों की गूंज है, सिंह दरबार — जहाँ से देश चलता था — अब सिर्फ राख है। और सबसे बड़ा सवाल ये है कि आख़िर क्यों?

गुस्से की आग: जब जनता का धैर्य टूटा
कई सालों से नेपाल की जनता एक सच्चे बदलाव की आस लगाए बैठी थी। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और नेताओं के झूठे वादों ने लोगों का भरोसा तोड़ दिया था। और फिर जब सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया गया, तो जैसे आग में घी पड़ गया।
तीन दिन से जारी यह आंदोलन अब सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि क्रांति बन चुका है। ऐसी क्रांति, जिसमें नारे नहीं, गोलियां गूंज रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट जला, इंसाफ की फाइलें राख हुईं
सोचिए, एक देश का सबसे बड़ा न्यायालय, जो लोगों को उम्मीद देता है, जब वो खुद आग में जल जाए — तो इंसाफ किससे मांगे?
25,000 से ज्यादा केस फाइलें खाक हो गईं। ये सिर्फ दस्तावेज़ नहीं थे — ये उन लोगों की ज़िंदगी थीं, जो सालों से न्याय के इंतज़ार में थे।
आज शायद उन लोगों को लग रहा होगा कि इंसाफ अब कभी नहीं मिलेगा।

जब सेना ने संभाली कमान, लेकिन हालात नहीं संभले
मंगलवार रात 10 बजे के बाद, सेना ने पूरे देश का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया।
लेकिन क्या इससे हालात सुधरे?
नहीं।
काठमांडू में गोलीबारी हुई, बंकर बने, लोग घरों में बंद हैं और 500 से ज्यादा कैदी जेल तोड़कर भाग चुके हैं।
सेना ने 27 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है। उनके पास से लाखों की नकदी, हथियार और गोला-बारूद मिले हैं। मगर इससे किसी का भरोसा वापस नहीं आ रहा।
प्रधानमंत्री भागे, नेता पिटे, अफसर हेलिकॉप्टर से फरार
कल्पना कीजिए —
जहां प्रधानमंत्री ओली को घर में आग लगने के बाद हेलिकॉप्टर से सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना पड़ा।
जहां तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों के घर जला दिए गए।
जहां एक पूर्व पीएम की पत्नी जिंदा जल गई।
जहां विदेश मंत्री को भीड़ ने घर में घुसकर पीटा।
ये कोई फिल्म नहीं है — ये नेपाल की सच्चाई है।
इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
नेपाल ने 2008 में राजशाही खत्म कर लोकतंत्र को अपनाया था। मगर 2025 में हालात देखकर लगता है, क्या हमने कुछ सीखा ही नहीं?

1996 से 2006 तक चले गृहयुद्ध में 17,000 लोग मारे गए थे।
और अब 2025 में, एक बार फिर लाशें बिछ रही हैं — लेकिन इस बार दुश्मन कोई और नहीं, हम खुद हैं।
और आम आदमी…? बस जलता रहा
इन सब के बीच जो सबसे ज्यादा पिसा, वो है आम नेपाली नागरिक।
जो सिर्फ स्कूल जाना चाहता था, जो सिर्फ अस्पताल में इलाज चाहता था, जो सिर्फ एक नौकरी चाहता था। वो आज घर में कैद है, आंखों में डर और दिल में गुस्सा लिए।
अब आगे क्या?
ओली के इस्तीफे के बाद कई नए चेहरे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं — मगर क्या ये लोग कोई बदलाव ला पाएंगे?
क्योंकि सवाल सिर्फ कुर्सी का नहीं,
सवाल है भरोसे का,
इंसाफ का,
और सबसे बढ़कर — नेपाल के भविष्य का।
क्या अब बदलाव आएगा या ये आग सब कुछ जला देगी?
नेपाल को अब एक नेता नहीं, एक ईमानदार आंदोलन की जरूरत है।
- एक ऐसा आंदोलन जो सिर्फ सत्ता को नहीं, सोच को बदलने आए।
- जहां नफरत की जगह संवाद हो,
- और लाशों की जगह उम्मीदें पैदा हों।
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