एक देश की चीख, एक नेता की चुप्पी
नेपाल पहाड़ों से घिरा एक शांत देश, जहां बुद्ध की धरती से शांति की आवाज़ आती है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से यहां सिर्फ आंसुओं की नमी, लाठी की चोट और सत्ता की खामोशी गूंज रही है।

8 सितंबर की रात, काठमांडू की सड़कों पर कुछ बदले-बदले से हालात थे। नारे लग रहे थे, लोग सड़क पर थे, लेकिन पुलिस भी अलग मूड में थी। लाठी, आंसू गैस और गोली की धमक के बीच एक बात सामने आई पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने पुलिस को ‘हर हाल में आंदोलन कुचलने’ का आदेश दिया था।
जब लोकतंत्र डरा, और जनता घायल हुई
एक देश का लोकतंत्र तब चरमरा जाता है जब सत्ता में बैठा व्यक्ति जनता की आवाज़ से डरने लगता है।
ओली पर आरोप है कि उन्होंने पुलिस को सीधे तौर पर आदेश दिया कि प्रदर्शनकारियों को “काबू में लाओ, चाहे जो हो जाए”। इसका नतीजा यह हुआ कि कई युवा, महिलाएं, छात्र और बुजुर्ग घायल हो गए। काठमांडू के प्रमुख हॉस्पिटल्स में बिस्तर कम पड़ गए। एक माँ अपने बेटे के सिर पर पट्टी बाँधते हुए बार-बार यही कहती दिखी
“ये वही देश है जिसमें मेरे बेटे ने भरोसा किया था?”
इसी दबाव के बीच ओली ने 9 सितंबर को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। ओली अब सेना की सुरक्षा में अज्ञात जगह पर छिपे हैं। FIR दर्ज हो चुकी है, लेकिन गिरफ्तारी की कोई खबर नहीं।
नई चुनौती: कार्यवाहक पीएम सुशीला कार्की
जब एक तरफ पूरा देश सुलग रहा था, उसी समय इतिहास लिखा गया। नेपाल की पहली महिला कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनीं सुशीला कार्की।
कार्की ने शपथ लेते ही सबसे पहला काम किया घायल आंदोलनकारियों से मिलने अस्पताल पहुंचीं। ये सिर्फ एक राजनीतिक कदम नहीं था, यह जनता के घावों पर मरहम रखने की एक ईमानदार कोशिश थी। उनका चेहरा थका हुआ था, लेकिन आंखों में सच्चाई की चमक थी। उन्होंने कहा,
“इस देश को फिर से जोड़ना है, और ये काम सिर्फ सत्ता से नहीं, संवेदनशीलता से होगा।”
उन्हें 5 मार्च 2026 तक चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी दी गई है एक छोटी सी अवधि, लेकिन बहुत बड़ा काम।

कर्फ्यू की बंदिशें और डर का माहौल
हालांकि काठमांडू के कुछ इलाकों से कर्फ्यू हटा लिया गया है, लेकिन 6 स्थानों पर अब भी हालात गंभीर हैं। 5 से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक है, भूख हड़ताल, धरना या जुलूस तक की इजाज़त नहीं है। सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था अगले दो महीनों तक जारी रहेगी। लेकिन सवाल ये उठता है क्या इस डर के माहौल में लोकतंत्र सांस ले पाएगा?
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