बुजुर्ग नेताओं से तंग आकर बगावत, जब कोई पीढ़ी चुप नहीं रहती
नेपाल इन दिनों इतिहास के सबसे नाजुक मोड़ पर खड़ा है। जहां एक ओर सियासी गलियारों में घबराहट है, वहीं दूसरी ओर सड़कों पर एक पूरी पीढ़ी का उबाल देखा जा रहा है GenZ। ये वही पीढ़ी है जिसने मोबाइल स्क्रीन पर बदलाव का सपना देखा, और अब उसे हकीकत में बदलने के लिए खूनपसीना बहा रही है।

बुजुर्ग नेताओं की असफलता, भ्रष्टाचार की जड़ें, और उम्मीदों का दम घुटता भविष्य युवाओं का सब्र अब जवाब दे चुका है। यह सिर्फ एक राजनीतिक आंदोलन नहीं है, यह जनता की आत्मा से निकला आक्रोश है।
काठमांडू की सड़कों पर आजकल सिर्फ नारों की गूंज नहीं, बल्कि गहराई से उठी एक पुकार सुनाई दे रही है हम थक चुके हैं!
अनिल बनिया और दिवाकर दंगल जैसे युवा नेता कह रहे हैं कि उनका मकसद संविधान खत्म करना नहीं, संसद को नए सिरे से बनाना है। यानी कि लोकतंत्र तो चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं जो 50 साल पुराने नेताओं के दम पर चल रहा हो।
हमने शांति से आंदोलन की अपील की थी, लेकिन आगजनी करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता थे। – अनिल बनिया
दंगल कहते हैं हम अभी परिपक्व नहीं हैं, लेकिन ये बुजुर्ग तो सड़ चुके हैं। कितनी ईमानदार बात है। ये स्वीकार करना कि आप अभी तैयार नहीं, पर फिर भी सामने खड़े हैं… यही साहस है।

ऑनलाइन सर्वे से अंतरिम प्रधानमंत्री के लिए दो नाम उभरे सुशीला कार्की और कुलमान घीसिंग। एक न्याय की प्रतीक, तो दूसरा उस रोशनी का चेहरा जिसने नेपाल को अंधेरे से निकाला।
सिस्टम के खिलाफ नहीं, सड़ चुके सिस्टम के खिलाफ
यह GenZ नेता संविधान जलाने की बात नहीं कर रहे, लेकिन वे यह साफ कह रहे हैं कि अब इसमें जनता की असल आवाज शामिल होनी चाहिए। बात केवल कागज़ी सुधारों की नहीं, बल्कि मानसिक बदलाव की है।
नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री झालानाथ खनाल का घर जला दिया गया, उनकी पत्नी गंभीर रूप से झुलस गईं। ये हिंसा किसी का समाधान नहीं है, लेकिन ये भी सोचिए किस कदर टूट चुका होगा एक आम युवा, जो यह कदम उठाने को मजबूर हुआ?
और फिर, जो सबसे ज़्यादा डराने वाला सच सामने आया जेल से भागे 14,000 से ज्यादा कैदी, और प्रदर्शन के बीच लूट, आगजनी, और मौतें। सवाल उठता है, क्या इस आंदोलन को कहीं से ‘हाईजैक’ किया जा रहा है?

पूर्व अटॉर्नी जनरल युवराज संग्रौला की बात गौर करने लायक है संविधान में खामियां हैं, लेकिन उसे खत्म करने से देश डूबेगा।
ये केवल एक आंदोलन नहीं, एक इमोशनल विस्फोट है
ये लड़ाई केवल सत्ता की नहीं है। यह आत्मसम्मान, भविष्य और भरोसे की लड़ाई है। नेपाल का युवा अब पूछ रहा है कब तक आप हमें सिर्फ भीड़ समझोगे? और शायद, भारत सहित पूरे दक्षिण एशिया को यह सुनना चाहिए।
कुलमान घीसिंग जैसे लीडर अगर देश संभालेंगे, तो शायद देश को फिर से उजियारा मिलेगा। लेकिन ये तभी होगा जब पुरानी सोच खुद पीछे हटेगी, और नए सपनों के लिए जगह बनाएगी।

अब बदलाव को रोका नहीं जा सकता
Nepal में GenZ की ये क्रांति सिर्फ राजनीतिक नहीं, यह एक सामाजिक पुनर्जागरण है। इसमें खतरे भी हैं, लेकिन हर बड़ा बदलाव दर्द से ही गुजरता है। बुजुर्गों के लिए ये एक आखिरी मौका है या तो युवाओं को गले लगाएं, या फिर इतिहास बनकर पीछे रह जाएं। क्योंकि अब वक्त बदल चुका है, और GenZ सिर्फ ट्वीट नहीं करता, वो अब सड़कों पर है।

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