राजनीति, परिवार और विरासत के इर्द-गिर्द घूमती कहानी
कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो महज कागज़ों में दर्ज केस नहीं होतीं। उनमें वक़्त की गंध होती है, इतिहास की परतें और राजनीति की चालें लिपटी होती हैं। नेशनल हेराल्ड केस कुछ ऐसा ही है सिर्फ अदालत की चार्जशीट नहीं, बल्कि देश के सबसे पुराने राजनीतिक परिवार के खिलाफ उठे वो सवाल हैं, जो आज की तारीख़ में एक नए मोड़ पर आ खड़े हुए हैं।

आज, राउज एवेन्यू कोर्ट उस चार्जशीट पर फैसला सुनाएगा जो प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दायर की है। कोर्ट ये तय करेगा कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और अन्य आरोपियों पर आरोप तय होंगे या नहीं। बहस 14 जुलाई को पूरी हो चुकी थी और तब से अदालत इस फैसले पर विचार कर रही थी। अब वो दिन आ गया है।
एक अख़बार से अरबों की संपत्ति तक
जिन्होंने इतिहास में ‘नेशनल हेराल्ड’ नाम सुना है, उनके लिए ये सिर्फ एक अख़बार नहीं था। ये वो वक़्त था जब शब्दों से आज़ादी लड़ी जाती थी, और ‘नेशनल हेराल्ड’ उस लड़ाई की आवाज़ था। लेकिन वक़्त बदला, अख़बार बंद हुआ, संपत्तियाँ बचीं… और अब, उसी विरासत पर सवाल उठ रहे हैं।
ED का आरोप है कि एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL), जो नेशनल हेराल्ड अखबार चलाता था, भले ही आर्थिक रूप से घाटे में थी, लेकिन उसके पास लगभग 2000 करोड़ की संपत्तियाँ थीं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी ने AJL को 90 करोड़ रुपए का कर्ज दिया जो कभी वापस नहीं आया। और फिर, ED के मुताबिक, यहीं से कहानी में मोड़ आया।

बताया जाता है कि सोनिया और राहुल गांधी ने ‘यंग इंडियन’ नाम की कंपनी बनाई, जिसमें दोनों की 76% हिस्सेदारी है, और इसी कंपनी के ज़रिए AJL का अधिग्रहण कर लिया गया। आरोप है कि ये लेन-देन केवल कागज़ों पर हुआ और असल में ये संपत्तियों को हड़पने की रणनीति थी।
सिर्फ कोर्ट केस नहीं, एक पारिवारिक महागाथा
ये मामला इतना सीधा नहीं है कि उसे सिर्फ लीगल टर्म्स में बांध दिया जाए। राहुल गांधी जब ED दफ्तर पहुंचे थे, तो देश ने एक पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे को पांच दिन तक घंटों-घंटों पूछताछ में देखा। जून 2022 की वो तस्वीरें अब भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं गर्मी की दोपहर, दिल्ली की सड़कें और उस सफेद SUV में बैठा एक शख्स जिसे देश ने कभी ‘युवराज’ कहा था।
फिर सोनिया गांधी की बारी आई एक उम्रदराज़ नेता, जिन्हें कभी देश ने एक ‘त्याग की मूर्ति’ के रूप में देखा था, वो भी पूछताछ के घेरे में थीं। देशभर में यह बहस चल पड़ी थी क्या ये कार्रवाई कानून के मुताबिक है, या फिर राजनीतिक बदले की बू आती है?
राजनीतिक रंग गहराते हैं
इस केस में सबसे दिलचस्प बात ये है कि इसे शुरू करने वाले नेता खुद भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी थे। 2012 में दाखिल याचिका में उन्होंने आरोप लगाया था कि सिर्फ 50 लाख में 2000 करोड़ की संपत्तियाँ हासिल की गईं। और तब से ये मामला धीरे-धीरे राजनीति की सबसे उलझी गलियों में से एक बन गया।

हर सुनवाई, हर समन, और हर प्रेस कॉन्फ्रेंस के साथ ये केस सत्ता और विपक्ष के बीच का मोहरा बन गया है। कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताती रही है, जबकि सरकार इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई।
आज क्या हो सकता है?
अगर कोर्ट आज आरोप तय करता है, तो इसका मतलब होगा कि मामला औपचारिक रूप से ट्रायल की ओर बढ़ेगा। यानी फिर गवाह होंगे, बयान होंगे, और सालों तक अदालत के चक्कर लगेंगे। और अगर आरोप खारिज होते हैं, तो कांग्रेस राहत की सांस ले सकती है, लेकिन राजनीतिक बयानबाज़ी थमेगी नहीं।
निजी भी है, सार्वजनिक भी
सच कहें तो ये केस सिर्फ गांधी परिवार पर नहीं, बल्कि हमारी राजनीतिक संस्कृति पर भी सवाल उठाता है। क्या हम वाकई जवाबदेही चाहते हैं, या सिर्फ नामों की सियासत करते हैं? क्या सत्ता में रहने वाले लोगों के फैसलों की जांच होनी चाहिए? बिल्कुल। लेकिन क्या जांच निष्पक्ष दिखनी भी चाहिए? शायद उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
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