2050 तक आधी आबादी को लग सकता है चश्मा
बच्चों में मायोपिया: नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की हालिया स्टडी के अनुसार, 2050 तक दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) से ग्रसित हो सकती है। भारत में भी हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं — पिछले चार दशकों में 5 से 15 साल के बच्चों में मायोपिया के केस 7.5% तक बढ़ चुके हैं।
गांवों में यह दर 4.6% से बढ़कर 6.8% हो गई है। एक ही साल में स्कूली बच्चों में मायोपिया के मामले 49% तक बढ़े हैं।

मायोपिया क्या है? समझिए सरल भाषा में
मायोपिया एक ऐसी आंखों की समस्या है जिसमें व्यक्ति को दूर की चीजें धुंधली दिखती हैं, जबकि पास की चीजें साफ नजर आती हैं। इसे शॉर्ट-साइटेडनेस या निकट दृष्टि दोष भी कहा जाता है।
यह स्थिति आमतौर पर 6 से 14 वर्ष की उम्र में शुरू होती है और 20 वर्ष तक बढ़ सकती है। अब यह समस्या 5 साल तक के छोटे बच्चों में भी दिखने लगी है।
स्क्रीन टाइम बना सबसे बड़ा खतरा
आजकल बच्चे सुबह से रात तक स्क्रीन से जुड़े रहते हैं — स्कूल के स्मार्ट बोर्ड, मोबाइल, टीवी और लैपटॉप ने उनकी आंखों पर भारी दबाव डाल दिया है।
रिसर्च के अनुसार, जो बच्चे हफ्ते में 7 घंटे से ज्यादा स्क्रीन देखते हैं, उनमें मायोपिया का खतरा तीन गुना बढ़ जाता है।
बाहर खेलने का समय घटने से प्राकृतिक रोशनी और धूप की कमी भी एक बड़ा कारण है। धूप में रहने से रेटिना में डोपामिन रिलीज होता है, जो आंखों की ग्रोथ को संतुलित रखता है।

जेनेटिक्स और लाइफस्टाइल दोनों जिम्मेदार
अगर माता-पिता को मायोपिया है तो बच्चे में इसका रिस्क बढ़ जाता है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, पर्यावरणीय फैक्टर और स्क्रीन-आधारित जीवनशैली का प्रभाव और भी ज्यादा है।
हमारे पूर्वज अधिक समय बाहर बिताते थे, जिससे आंखें स्वस्थ रहती थीं। आज की पीढ़ी स्क्रीन पर निर्भर है — यही कारण है कि अगली पीढ़ी में मायोपिया तेजी से बढ़ेगा।
मायोपिया के प्रमुख रिस्क फैक्टर्स
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लगातार स्क्रीन पर नजर टिकाए रखना
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कम उम्र में मायोपिया की शुरुआत
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डायबिटीज वाले बच्चों में खतरा ज्यादा
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कम आउटडोर एक्टिविटी
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जेनेटिक हिस्ट्री
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कंप्यूटर पर लंबे समय तक काम करना
हाई मायोपिया से हो सकता है अंधापन
बचपन का मायोपिया अगर कंट्रोल न किया जाए तो यह हाई मायोपिया में बदल सकता है। इससे
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रेटिनल डिटैचमेंट,
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ग्लूकोमा,
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कैटरेक्ट,
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और मायोपिक मैकुलोपैथी जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।
हर 1 डायोप्टर मायोपिया बढ़ने पर अंधेपन का रिस्क 67% तक बढ़ जाता है।
कैसे पता लगाएं मायोपिया?
मायोपिया के शुरुआती लक्षण अक्सर साइलेंट होते हैं, इसलिए रेगुलर आई-चेकअप बेहद जरूरी है।
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9-11 साल की उम्र में पहला आई-टेस्ट कराएं
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अगर परिवार में किसी को मायोपिया है, तो 2 साल से ही जांच शुरू करें
टेस्ट्स:
विजुअल एक्यूटी टेस्ट, रिफ्रैक्शन, प्यूपिल एग्जाम, आई-प्रेशर और मूवमेंट चेक।
कैसे करें मायोपिया को कंट्रोल?
मायोपिया को सही दिशा में कंट्रोल किया जा सकता है —
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स्पेशल लेंस: मायोपिया कंट्रोल स्पैक्टेकल्स या सॉफ्ट कॉन्टैक्ट लेंस
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ऑर्थो-के लेंस (रात में पहनने वाले लेंस)
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एट्रोपाइन आई ड्रॉप्स — प्रोग्रेशन को स्लो करते हैं
लाइफस्टाइल में बदलाव करें

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स्क्रीन टाइम सीमित करें
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20-20-20 रूल अपनाएं — हर 20 मिनट बाद 20 सेकंड का ब्रेक लेकर 20 फीट दूर देखें
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रोज कम से कम 90 मिनट धूप में खेलें
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विटामिन A, C और ओमेगा-3 युक्त आहार लें
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धूम्रपान और अत्यधिक स्क्रीन उपयोग से बचें
FAQ: मायोपिया से जुड़े आम सवाल
FAQ 1
सवाल: बच्चों में मायोपिया क्यों बढ़ रहा है?
जवाब: स्क्रीन टाइम, कम आउटडोर एक्टिविटी और शहरी जीवनशैली इसके प्रमुख कारण हैं।
FAQ 2
सवाल: बिना लक्षण के कैसे पता चलेगा?
जवाब: 6 साल की उम्र के बाद हर बच्चे का रेगुलर आई-टेस्ट कराना जरूरी है।
