Mohan Bhagwat on US Tariff : हम मजबूत हुए तो उनका क्या होगा? ये शब्द किसी आम व्यक्ति के नहीं थे, ये थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के वो भी एक शांतिपूर्ण मंच पर, जहां चर्चा आध्यात्म की हो रही थी, लेकिन बात पहुंच गई अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक।

नागपुर में ब्रह्माकुमारी विश्व शांति सरोवर के 7वें स्थापना दिवस पर दिए गए भाषण में भागवत ने वो कहा, जिसे अक्सर हम सोचते तो हैं, लेकिन कह नहीं पाते।
Mohan Bhagwat on US Tariff : भारत से डर क्यों?
भागवत ने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ था अमेरिका और पश्चिमी देशों की उस नीतियों की ओर, जो भारत के बढ़ते प्रभाव से असहज हैं।
डर के चलते भारत पर टैरिफ लगाया जा रहा है। सोचते हैं, हम मज़बूत हुए तो उनका क्या होगा। मोहन भागवत
इस बयान का संदर्भ भी था ट्रंप द्वारा भारत पर 25% टैरिफ लगाए जाने का निर्णय, जो 7 अगस्त से लागू हुआ। इसके पीछे कारण बताया गया कि भारत रूस से सस्ता तेल लेकर उसे बाजार में ऊंचे दाम पर बेच रहा है। पर क्या असल वजह सिर्फ तेल है? या ये वैश्विक शक्ति संतुलन का डर है?
मैं से हम की ओर भागवत का आध्यात्मिक संदेश
भागवत ने ये बयान सिर्फ राजनीतिक ताने-बाने में नहीं दिया, बल्कि उसे एक गहरे आध्यात्मिक दर्शन से जोड़ा:
“दुनिया को ‘मैं’ छोड़कर ‘हम’ की भावना को समझना होगा”।
उनके मुताबिक,
“जब तक इंसान अपने असली स्वरूप को नहीं समझता, तब तक समस्याएं बनी रहेंगी देश की हों या व्यक्ति की”।
ये बात सिर्फ राष्ट्रों पर लागू नहीं होती, बल्कि आम ज़िंदगी में भी उतनी ही सटीक बैठती है। जब हम खुद को दूसरों से ऊपर रखते हैं, तब टकराव तय है। जब हम जुड़ते हैं, तब समाधान निकलता है।
भारत को मार्गदर्शक मानने की अपील
भागवत का यह भी मानना है कि आज जब दुनिया भटक रही है, समाधान ढूंढ़ रही है, तो भारत के पास उसे एक वैकल्पिक रास्ता दिखाने की क्षमता है।
दुनिया अर्थव्यवस्था से नहीं, हमारे अध्यात्म से जुड़ती है।
उन्होंने ये भी दोहराया कि भारत चाहे जितना आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाए 3 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी भी बना ले दुनिया हमें हमारी आत्मा से पहचानेगी, संपत्ति से नहीं।
अमेरिकी टैरिफ और भागवत के पुराने बयान: एक सिलसिला
🗓️ 27 अगस्त 2025:
अंतरराष्ट्रीय व्यापार दबाव में नहीं होना चाहिए। आत्मनिर्भरता जरूरी है।
🗓️ 8 अगस्त 2025:
दुनिया भारत की अर्थव्यवस्था से नहीं, उसके अध्यात्म से प्रभावित है।
ट्रेड वार हो या स्पिरिचुअल वार भागवत साफ कर चुके हैं कि भारत किसी दबाव में झुकने वाला नहीं।
मोहन भागवत का बयान सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं था, ये एक विचारधारा की झलक थी जो भारत को केवल एक व्यापारिक शक्ति नहीं, एक नैतिक शक्ति के रूप में देखना चाहती है।

उनकी बातों में भाव था, और एक स्पष्ट चेतावनी भी भारत अब सिर्फ सुनने वाला देश नहीं, कहने और तय करने वाला देश बन रहा है। जब सात समंदर की दूरी हो, तो डर कैसा?
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