क्या हिंदू‑मुस्लिम रिश्तों में आएगा नया मोड़?
RSS प्रमुख मोहन् भागवत और उनके सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने दिल्ली में मुस्लिम धर्मगुरुओं जैसे इमाम उमर अहमद इलियासी से मुलाकात की है। इस अनसरवादी कदम को लेकर अब देशव्यापी चर्चा तेज़ है। क्या यह सिर्फ प्रतीक है या इससे संवाद की नई कुँजी खुलने जा रही है?
मुलाकात का पूरा परिदृश्य
भागवत ने नई दिल्ली की मस्जिद और मदारसे का दौरा किया, जहाँ उन्होंने इमाम उमर अहमद इलियासी के साथ करीब एक घंटे तक गहरी चर्चा की दत्तात्रेय होसबाले ने बैठक में धर्मांतरण रोकने, जनसंख्या नीति और पूजा‑स्थलों को लेकर संघ की विचारधारा स्पष्ट की है

खास बातें: बातचीत में क्या चला?
1. ‘काफिर’ शब्द पर आपत्ति
मुल्लाओं ने काफिर जैसे शब्दों के अपमानजनक उपयोग पर सवाल उठाया। भागवत ने इस पर सहमति जताई और कहा कि सबका D.N.A एक‑सा है ।
2. धर्मांतरण और जनसंख्या नीति
होसबाले ने जोर देकर कहा कि जबरन धर्मांतरण गलत है, इसे रोकने वाले कानूनका RSS समर्थन करेगा, साथ ही जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता पर बल दिया।
3. हिंदू‑मुस्लिम अखंडता
होसबाले ने कहा, “हम सब मूलतः हिंदुस्तानी हैं। कोई जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करे, उसे दोनों लाभ नहीं मिल सकते”
4. ‘मुस्लिम आउटरीच’ का दावा
RSS के हवाले से कहा गया कि पहल मुस्लिम धर्मगुरुओं ने की, संघ तो मुलाकात के लिए तैयार था
आलोचना और स्वागत दोनों
आलोचना
- AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “ये सब सिर्फ मुस्लिम इंटेलेक्चुअल्स का symbolic मीट है, ground reality से दूर” ।
- एनडीटीवी के एक ब्लॉग ने इसे “प्रतीकात्मक पहल” बताया, लेकिन उससे वास्तविक संवाद की उम्मीद कम जताई ।
स्वागत
- मुल्ला इलियासी ने मोहन भागवत को “राष्ट्र पिता” कहा, और उनकी बातों में राष्ट्रात्मक एकता की भावना देखी।
- RSS‑MRM की गोवा मीटिंग में मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने भी आर्शीवाद दिया कि संघ को लेकर संशय कम हुआ ।
आगे की राह: क्या बदल सकता है?
- संवाद की गहराई: यह पहल सिर्फ symbolic न रह जाए, बल्कि नियमित बातचीत और धार्मिक‑सांस्कृतिक मेलजोल का आधार बने।
- राजनीतिक असर: BJP‑RSS की रणनीति में मुस्लिम‑समुदाय को जोड़ने की संभावनाओं को बल मिल सकता है।
- समाज‑स्तर पर असर: अगर grassroots पर भी इस विचार को स्वीकार्यता मिल जाती है, तो हिंदू‑मुस्लिम रिश्तों में स्थायित्व आ सकता है।

RSS प्रमुखों द्वारा मुस्लिम धर्मगुरुओं से यह मुलाकात सिर्फ एक राजनीतिक या सामाजिक रूप से प्रतीकात्मक कदम नहीं है। इसमें संघ‑मुस्लिम संवाद की संभावनाएँ मौजूद हैं। हालांकि आलोचना भी है कि यह जमीन‑स्तर पर बदलाव से दूर है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है क्या इस मुलाकात से विकसित संवाद को एक ठोस रूप मिल पायेगा? या फिर यह केवल एक कलात्मक ‘पिक्चर‑प्लान’ साबित होगा? आने वाले समय में इस कदम के पीछे छिपे वास्तविक मायने सामने आएंगे।
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