Maoists call surrendered Naxals traitors : छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सली संगठन इन दिनों मतभेदों से घिरा नजर आ रहा है। हाल ही में पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने वाले कई वरिष्ठ नक्सलियों को माओवादी संगठन ने गद्दार बताया है। संगठन ने अपने क्षेत्रीय पर्चों में यह संदेश जारी करते हुए कहा कि जिन्होंने आत्मसमर्पण किया है, उन्होंने जनयुद्ध और संगठन के सिद्धांतों के साथ विश्वासघात किया है।
यह बयान जंगल के अंदर इलाकों में लगाए गए पर्चों और पत्रों के माध्यम से दिया गया, जिससे यह साफ हो गया है कि आत्मसमर्पण की बढ़ती घटनाओं ने माओवादी नेतृत्व को अंदर तक झकझोर दिया है।
फैसला मेरा नहीं, बसवा राजू का भी था-रूपेश
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली रूपेश,जो संगठन में क्षेत्रीय मिलिट्री कमांडर था, उसने मीडिया से कहा कि नक्सली हिंसा की राह अब व्यर्थ साबित हो चुकी है। उसने यह भी खुलासा किया कि सरेंडर का फैसला उसका अकेले का नहीं, बल्कि वरिष्ठ माओवादी नेता बसवा राजू का भी था।
रूपेश ने कहा,कई बार हमें लगा कि संगठन अब अपने रास्ते से भटक गया है। आम आदिवासियों की रक्षा के नाम पर उन्हीं पर अत्याचार किया जा रहा है। ऐसे माहौल में हमने फैसला किया कि अब अपने भविष्य को बचाया जाए और समाज की मुख्यधारा में लौटा जाए।
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लगातार बढ़ रही आत्मसमर्पण की घटनाएं
पिछले कुछ महीनों में बस्तर, बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों में माओवादियों के आत्मसमर्पण की घटनाएं बढ़ी हैं। पुलिस और सुरक्षा बलों के लगातार दबाव, विकास कार्यों के प्रसार और आत्मसमर्पण नीति के आकर्षक प्रावधानों ने कई नक्सली नेताओं को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया है।
जानकारी के अनुसार, पिछले तीन महीनों में 150 से अधिक माओवादी कार्यकर्ताओं ने हथियार डाल दिए हैं, जिनमें कई क्षेत्रीय कमांडर और महिला कैडर भी शामिल हैं।
संगठन में मतभेद और हताशा
संगठन के भीतर नेतृत्व संकट और विचारधारा की कमजोरी ने उसके ढांचे को कमजोर किया है। केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय कमांडरों के बीच की असहमति अब खुलकर सामने आने लगी है। नए युवाओं की कमी और लगातार घटते जनसमर्थन ने भी माओवादी नेटवर्क को हताश कर दिया है।
माओवादी गुटों में यह डर गहराने लगा है कि आने वाले समय में बड़ी संख्या में और कैडर आत्मसमर्पण कर सकते हैं।
प्रशासन की रणनीति को मिली सफलता
राज्य सरकार ने आत्मसमर्पण करने वालों के पुनर्वास के लिए योजनाएं चलाई हैं, जिसके अंतर्गत सरेंडर करने वालों को सुरक्षा, आर्थिक सहायता और कौशल विकास का अवसर दिया जाता है। इस नीति से प्रशासन को बड़ी सफलता मिली है और इससे नक्सली हिंसा पर नियंत्रण पाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
माओवादी संगठन के भीतर जारी मतभेद,आत्मसमर्पण की लगातार बढ़ती घटनाएं और संगठन द्वारा गद्दार करार देने वाले बयान यह संकेत देते हैं कि लाल गलियारे की पकड़ धीरे-धीरे ढीली पड़ रही है। अब सवाल यह है कि शेष बचे नक्सली गुट कब तक अपने पुराने रास्ते पर टिके रहेंगे या मुख्यधारा में लौटने का साहस दिखाएंगे।
