मध्यप्रदेश गणतंत्र दिवस झांकी: दिल्ली के कर्तव्य पथ पर इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में मध्यप्रदेश की झांकी कुछ खास संदेश लेकर उतरेगी। 26 जनवरी 2026 को लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती वर्ष के मौके पर उनकी जीवन यात्रा, प्रशासनिक दक्षता और आध्यात्मिक योगदान को झांकी के जरिए देश-दुनिया के सामने रखा जाएगा.
मध्यप्रदेश गणतंत्र दिवस झांकी: इस वर्ष कुल 30 झांकियां शामिल
गणतंत्र दिवस परेड में इस वर्ष कुल 30 झांकियां शामिल होंगी. इनमें 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की भागीदारी रहेगी। ऐसे में मध्यप्रदेश की झांकी को लेकर खास उत्साह है, क्योंकि यह झांकी केवल इतिहास नहीं, बल्कि शासन, सेवा और संस्कृति का संदेश भी देगी
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मध्यप्रदेश गणतंत्र दिवस झांकी: हर झांकी एक कहानी
मध्यप्रदेश की झांकी को तीन प्रमुख हिस्सों में सजाया गया है. अग्र भाग में हाथ में शिवलिंग धारण किए लोकमाता अहिल्याबाई की वात्सल्यमयी प्रतिमा होगी। यह दृश्य भारतीय मातृशक्ति की करुणा और आध्यात्मिक सामर्थ्य का प्रतीक माना जा रहा है. झांकी के मध्य भाग में लोकमाता को अश्व पर सवार एक कुशल प्रशासक और वीरांगना के रूप में दर्शाया जाएगा। यह दृश्य उनके दृढ़ नेतृत्व और न्यायप्रिय शासन की याद दिलाएगा, जिसने मालवा से लेकर देश के कई हिस्सों तक स्थायी छाप छोड़ी।
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महेश्वर की भव्यता का जीवंत चित्र
झांकी के पिछले हिस्से में मां नर्मदा के तट पर स्थित ऐतिहासिक महेश्वर घाट, मंदिर और किले की भव्यता को उकेरा जाएगा। यह हिस्सा अहिल्याबाई के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को दर्शाएगा।
मंदिरों के जीर्णोद्धार से लेकर महेश्वरी साड़ी तक
झांकी में लोकमाता द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों में कराए गए मंदिरों के जीर्णोद्धार को भी पैनल के माध्यम से दिखाया जाएगा। काशी विश्वनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, सोमनाथ और जगन्नाथपुरी जैसे प्रमुख तीर्थों का उल्लेख इस प्रस्तुति को और प्रभावशाली बनाएगा. एक और खास आकर्षण रहेगा महेश्वरी साड़ी बुनती महिलाएं। यह दृश्य मध्यप्रदेश की आर्थिक आत्मनिर्भरता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक होगा, जो लोकमाता की दूरदर्शी सोच को आज के संदर्भ में जोड़ता है.
गौरव, संस्कृति और संदेश
कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश की यह झांकी लोकमाता अहिल्याबाई होलकर के आदर्शों, उनके प्रशासनिक कौशल और सांस्कृतिक योगदान को एक साथ पिरोने की कोशिश है. गणतंत्र दिवस पर कर्तव्य पथ से यह संदेश जाएगा कि सुशासन, सेवा और संस्कार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
