Maa Tulja Bhavani Temple: आगर मालवा जिले के आगर नगर से महज 2 किलोमीटर दूर, दक्षिण-पूर्व दिशा की पहाड़ी पर मां तुलजा भवानी का प्राचीन मंदिर स्थित है। प्राकृतिक गुफा में बने इस मंदिर को गुफा बर्डा माता मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां स्थापित माता की मूर्ति को स्वयंभू माना जाता है। मंदिर में अंदर घुसते ही एक शेर विराजमान है।
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तीन रूपों में प्रकट होती हैं माता..
इतिहासकार बताते हैं कि यह स्थान बौद्धकालीन है। मान्यता है कि माता तुलजा भवानी दिन में तीन बार अपना स्वरूप बदलती हैं—
1. सुबह बाल रूप में,
2. दोपहर युवती रूप में,
3. शाम को वृद्धा स्वरूप में।
यह आस्था आज भी भक्तों के मन को गहराई से प्रभावित करती है।

गुफा का रहस्यमयी मार्ग..
मंदिर की सबसे चर्चित गाथा इसकी गुफा से जुड़ी है। कहा जाता है कि यह गुफा मार्ग उज्जैन स्थित राजा भर्तृहरि की गुफा तक जाता था। वर्षों पहले उज्जैन के तत्कालीन आईजी और पुरातत्ववेत्ता एमपी द्विवेदी ने इस रहस्यमयी मार्ग की खोज के प्रयास भी किए थे।
शेर भी करते थे दर्शन…
स्थानीय लोग बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक जंगल से शेर मंदिर परिसर में आया करते थे। खास बात यह थी कि वे आरती के समय रुकते और बिना किसी को नुकसान पहुँचाए वापस लौट जाते थे। यह रहस्य आज भी लोगों की श्रद्धा और विश्वास को और गहरा करता है।

भक्तों के सहयोग से होता है जीर्णोद्धार..
मां तुलजा भवानी मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1945 से भक्तों के सहयोग से होता आ रहा है। हर वर्ष चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहाँ विशेष भव्य आयोजन किए जाते हैं। सुबह की आरती से लेकर देर रात तक भक्तों की भीड़ मंदिर परिसर में बनी रहती है।

आस्था और चमत्कार का संगम…
प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे इस मंदिर में भक्त न सिर्फ़ माता के दर्शन करते हैं बल्कि यहां की रहस्यमयी गुफाओं और पौराणिक मान्यताओं से भी गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं। यही कारण है कि मालवा अंचल में मां तुलजा भवानी मंदिर को आस्था और चमत्कार का अद्वितीय संगम माना जाता है।
भक्त महेश कुमार बताते हैं कि-
मंदिर बहुत पुराना हैं, ये माता जी पहाड़ो में से स्वंय प्रकट हुई थी। जहां से माता प्रकट हुई थी वहां एक गुफा है, जो डायरेक्ट उज्जैन हरसिद्धी मंदिर में निकलती है

मंदिर में देखा था एक चमत्कारी घटना उन्होंने बताया कि – आज से लगभग 30 साल पहले एक लंगड़ा शेर आता था, जो रात को 12 बजे से सुबह के 3-4 बजे तक यहां बैठा रहता था। परंतु वो लोगों को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाता था।
बहादुर सरपंच सिंह बताते हैं कि –
उनके पूर्वज ने बताया था कि माता पहाड़ चीरकर निकली थी। यहां नवरात्रि में विशाल भंडारे का आयोजन कराया जाता है। और यहां एक गुफा है जो उज्जैन में निकलती है।

नंद लाल सोनी बताते है कि-
यह मंदिर लगभग 2000 साल पुराना है। इन्होंने बताया कि हमने देखा था कि – एक शेर आता था माता के दर्शन करना। इस मंदिर में जो भक्त सच्चे दिल से जो मांगता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है।

चमत्कारिक दैवीय स्थल, श्रद्धा का केन्द्र…
यह चमत्कारिक दैवीय स्थल दशकों से श्रद्धा, जन आस्था और विश्वास का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। यहां विराजित छोटी और बड़ी दोनों माताएं, प्राकृतिक शांति और आसपास फैली हरियाली के कारण ‘बाड़ी माता’ के नाम से विख्यात हैं।

जन सहयोग से हुआ मंदिर का प्रारंभिक निर्माण…
करीब 100 वर्ष पूर्व ग्रामीणों ने सामूहिक सहयोग और आस्था के बल पर मंदिर का प्रारम्भिक निर्माण कराया था। तभी से यह स्थल भक्तों की आस्था और दिव्य अनुभव का अद्वितीय प्रतीक माना जाता है।
