जब ज़िंदगी ने थप्पड़ मारा
कभी-कभी ज़िंदगी एक ऐसा मोड़ लेती है जहाँ से आगे कुछ भी साफ़ नहीं दिखता। जैसे अचानक सब कुछ थम गया हो। नौकरी चली जाए, अपनों का साथ छूट जाए, या फिर कोई बड़ा सपना टूट जाए उस वक़्त लगता है जैसे हम खत्म हो गए। लेकिन क्या वाकई वहीं खत्म होते हैं हम? या वहीं से शुरू होता है कुछ नया?

ये कहानी है मनोज की, जो कभी बड़े सपने लेकर दिल्ली आया था। लेकिन ज़िंदगी ने उसके साथ जो किया, वो हर किसी के साथ कभी न कभी होता ही है।
जब टूटे तो संभलना भी आया
मनोज उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से दिल्ली आया था इंजीनियर बनने। पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन पैसे की तंगी ने उसे कई बार तोड़ने की कोशिश की। कभी ऑटो चलाया, कभी टिफिन पहुंचाया लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी।
सालों की मेहनत के बाद एक अच्छी नौकरी मिली। ज़िंदगी पटरी पर आ ही रही थी कि COVID-19 आ गया। नौकरी गई, किराया चुकाने के पैसे नहीं, और जिस दोस्त ने साथ देने का वादा किया था, वो भी कंधा झाड़ कर निकल गया। मनोज कई रातें बिना खाए सोया। लेकिन एक दिन, जब मेट्रो स्टेशन की बेंच पर बैठा था, एक भिखारी ने अपनी रोटी का आधा हिस्सा उसकी तरफ बढ़ाया।
“बेटा, तकलीफ़ में रुकना नहीं चाहिए। कोई न कोई रास्ता जरूर निकलता है,” उस बुज़ुर्ग की बात मनोज के दिल में उतर गई।
उस दिन के बाद उसने तय किया कि अब पीछे नहीं हटेगा। उसने यूट्यूब पर फ्री कोडिंग क्लासेज़ देखना शुरू किया। सोशल मीडिया का सहारा लेकर फ्रीलांसिंग प्रोजेक्ट्स करने लगा। दो साल में एक छोटी सी IT सर्विस कंपनी शुरू की और आज 15 लोगों को नौकरी दे रहा है।
जो टूटते नहीं, वही आगे बढ़ते हैं
मनोज की तरह हम सबकी ज़िंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं जब हम खुद को अकेला, हारा हुआ और खोया हुआ महसूस करते हैं। लेकिन असली कहानी वहीं से शुरू होती है, जहाँ से हम उठने का फैसला करते हैं।
जब ज़िंदगी हमें सबसे ज़्यादा तोड़ती है, तब वो हमें सिखा रही होती है कि हम क्या बन सकते हैं। जो लोग अंधेरे में भी अपने अंदर का उजाला ढूंढ लेते हैं, वही दूसरों के लिए रास्ता बन जाते हैं। हर संघर्ष के पीछे एक मौका छिपा होता है खुद को जानने का, खुद को बदलने का, और शायद किसी और की ज़िंदगी में उम्मीद बनने का।
आख़िरी बात दिल से
अगर आप भी किसी मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं, तो रुकिए मत। ये दौर भी गुज़र जाएगा। और शायद एक दिन, आपकी कहानी भी किसी और को जीने की वजह दे जाएगी।
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