लद्दाख हिंसा: नेपाल-कश्मीर से बाहरी लोग घायल मिले!
लेह जल रहा है, और सवाल धधक रहे हैं
लेह की सड़कों पर फिर से गूंज है – लेकिन इस बार ये आवाज़ें उम्मीद की नहीं, आक्रोश की हैं। 62 साल बाद मिग-21 की रिटायरमेंट भले ही सुर्खियों में थी, लेकिन उसी दिन लद्दाख की राजधानी लेह में बंदूकें, आंसू गैस और नारे गूंज रहे थे।
और अब, सोनम वांगचुक – वही पर्यावरणविद्, जिन्होंने “थ्री इडियट्स” के फुंसुख वांगडू को प्रेरित किया – उन्हें देशद्रोह जैसे आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार उन्हें पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तार करने की तैयारी में है।
हिंसा में नेपाली और कश्मीरी युवा घायल – संयोग या साजिश?
लेफ्टिनेंट गवर्नर कविंदर गुप्ता ने बयान दिया है कि हिंसा में घायल कुछ लोग नेपाल और कश्मीर के डोडा क्षेत्र से थे। पुलिस को इनका स्थानीय रिकॉर्ड नहीं मिल रहा। 7 नेपाली, कई कश्मीरी और बिना स्थानीय कनेक्शन के युवाओं का हिंसा में शामिल होना सिर्फ इत्तेफाक नहीं लगता। सवाल उठ रहे हैं – क्या यह आंदोलन को बदनाम करने की सोची-समझी चाल है?
वांगचुक का दावा मुझे चुप कराने की कोशिश हो रही है
सोनम वांगचुक ने एक वीडियो जारी कर कहा
मैं लद्दाख के लोगों की मांगों को शांतिपूर्वक उठा रहा था। अब सरकार मुझे हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है। ये लोगों का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने की कोशिश है।
वह भूख हड़ताल पर थे, छात्रों और आम नागरिकों का भारी समर्थन उन्हें मिल रहा था। लेकिन 24 सितंबर को जब लेह में प्रदर्शन हिंसक हुआ, तो सब कुछ बदल गया।
कर्फ्यू तीसरे दिन जारी, स्कूल-कॉलेज बंद
लेह में तीसरे दिन भी कर्फ्यू लगा है। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, कॉलेज बंद हैं, इंटरनेट रुक-रुक कर चल रहा है। प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी ऑफिस को आग के हवाले कर दिया। अब तक 60 गिरफ्तार, 4 की मौत, 80 घायल – जिनमें 40 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।
FCRA के नाम पर NGO पर शिकंजा, CBआई की जांच जारी
गृह मंत्रालय ने वांगचुक की NGO – SECMOL का विदेशी फंडिंग लाइसेंस रद्द कर दिया। और अब दूसरी संस्था HIAL पर भी FCRA के उल्लंघन की जांच हो रही है। वांगचुक कहते हैं,
“हमारी संस्थाएं गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देती हैं। हम विदेशी चंदे पर निर्भर नहीं। हमें फंसाया जा रहा है।”
लेकिन सरकार कह रही है कि फंड का गलत इस्तेमाल हुआ, और अब CBI अकाउंट्स खंगाल रही है।
क्या यह विरोध को दबाने की रणनीति है?
लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कोई नई बात नहीं। लेकिन जब यह मांग एकजुट और संगठित रूप में उठने लगी, तो हालात बदले। सरकार की नजरों में अब यह आंदोलन राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन गया है। लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह अस्तित्व का सवाल है – पहचान, रोज़गार, जमीन और संस्कृति का।
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