जस्टिस वर्मा का कैश केस: क्या सच में साज़िश है या सामने आ चुकी है
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जांच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी है। यह रिपोर्ट उस समय सामने आई जब उनके लुटियंस दिल्ली स्थित सरकारी आवास से आग लगने के बाद 500-500 रुपये के अधजले नोटों से भरे बोरे बरामद हुए।
क्या है याचिका में मांग?
जस्टिस वर्मा ने तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट को खारिज करने की अपील की है। उनका दावा है कि जांच प्रक्रिया ने उनके संवैधानिक और व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन किया है। उन्होंने CJI बीआर गवई से पूर्व CJI संजीव खन्ना द्वारा दी गई उनकी बर्खास्तगी की सिफारिश को भी रद्द करने की मांग की है।
जांच समिति की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
22 मार्च को बनाई गई जांच समिति में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधवालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जज अनु शिवरामन शामिल थीं। पैनल ने 64 पन्नों की रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा को दोषी पाया और कहा कि उन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।
रिपोर्ट के पांच अहम बिंदु
- चश्मदीदों की पुष्टि:
दिल्ली फायर सर्विस, पुलिस और अन्य चश्मदीदों ने स्टोर रूम में अधजले 500 के नोटों का ढेर देखा। 10 से ज्यादा गवाहों ने इस बात की पुष्टि की है। - जस्टिस वर्मा का मौन:
रिपोर्ट में कहा गया कि जस्टिस वर्मा ने वीडियो और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को खारिज नहीं किया। यह मौन स्वीकृति के समान माना गया। - परिवार की भूमिका:
स्टोर रूम में बिना अनुमति के कोई भी नहीं जा सकता था। जस्टिस वर्मा के दो कर्मचारियों ने खुद जले हुए नोट निकालने की बात कबूली, जिसकी पुष्टि वायरल वीडियो से हुई। - बेटी का विरोधाभास:
जस्टिस वर्मा की बेटी ने बयान में कहा कि वीडियो में मौजूद आवाजें कर्मचारियों की नहीं हैं, जबकि खुद कर्मचारी ने आवाज पहचानने की बात मानी। - पुलिस में रिपोर्ट नहीं:
जस्टिस वर्मा ने पूरे मामले को साज़िश बताया, लेकिन कभी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई। इसके बजाय चुपचाप इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर स्वीकार कर लिया।
55 गवाह, 10 दिन की जांच और गंभीर सवाल
जांच के दौरान 55 गवाहों के बयान लिए गए। इनमें दिल्ली पुलिस, CRPF, फायर डिपार्टमेंट और कोर्ट स्टाफ के लोग शामिल थे। रिपोर्ट में कहा गया कि स्टोर रूम पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का एक्टिव कंट्रोल था।
सियासी और संवैधानिक असर
यह याचिका ऐसे समय में दायर की गई है जब संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है, और माना जा रहा है कि वर्मा को हटाने का प्रस्ताव सत्र में रखा जा सकता है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को स्वीकार करता है और रिपोर्ट रद्द करता है, तो इससे इन-हाउस प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े होंगे।
न्यायपालिका की नैतिक जिम्मेदारी?
जस्टिस वर्मा ने अपने ऊपर लगे आरोपों को साजिश बताया, लेकिन सबूतों, गवाहों और रिपोर्ट की गंभीरता को नकारना आसान नहीं है। यह मामला भारतीय न्यायपालिका की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन गया है।
