दुर्लभ चर्म रोग ने बदला सोनामनी का जीवन
सोनामनी की बीमारी के कारण उसकी त्वचा सूर्य की रोशनी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो गई है। यह दुर्लभ चर्म रोग, संभवतः ज़ेरोडर्मा पिगमेंटोसम (Xeroderma Pigmentosum) जैसी स्थिति हो सकती है, जिसमें सूर्य की पराबैंगनी किरणें त्वचा को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं। इस बीमारी के कारण सोनामनी दिन के समय बाहर नहीं निकल पाती और उसे अंधेरे में रहना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर कोई डॉक्टर या चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं होने से उसका इलाज नहीं हो पाया है। यह स्थिति न केवल सोनामनी के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, बल्कि उसके परिवार के लिए भी भावनात्मक और आर्थिक बोझ बन गई है।
सीएम सोरेन ने लिया संज्ञान
सोनामनी की स्थिति को लेकर सोशल मीडिया पर कई लोगों ने आवाज उठाई, जिसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने X पर पोस्ट करते हुए इस मामले का तत्काल संज्ञान लिया। उन्होंने लिखा, “वर्णित मामले का त्वरित संज्ञान लेते हुए सिविल सर्जन को अपनी टीम के साथ सोनामुनी से मिलकर समुचित इलाज सुनिश्चित करने हेतु निर्देशित किया गया है।” इस निर्देश के बाद जिला प्रशासन और सिविल सर्जन को सोनामनी के इलाज के लिए तत्काल व्यवस्था करने का आदेश दिया गया है।
.@DCEastSinghbhum तत्काल संज्ञान लेकर सोनामणि को समुचित इलाज पहुँचाने की व्यवस्था सुनिश्चित करते हुए सूचना दें। https://t.co/jkZCK8G2sG
— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) June 2, 2025
Rare skin disease Jharkhand: स्वास्थ्य सेवाओं की कमी
कोराडकोचा सबर टोला, जहां सोनामनी का परिवार रहता है, एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है। सबर जनजाति, जो एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझ रही है। 2011 की सामाजिक-आर्थिक जनगणना के अनुसार, इस समुदाय की आबादी केवल 0.27% है, और उनकी स्वास्थ्य समस्याओं का मुख्य कारण शिक्षा की कमी और चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच का अभाव है। सोनामनी का मामला इस बात को रेखांकित करता है कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है।
समाज और प्रशासन से अपील
सोनामनी की कहानी ने न केवल स्थानीय समुदाय, बल्कि पूरे झारखंड में लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी और जिला प्रशासन से इस मामले में तत्काल कार्रवाई की मांग की है। स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सोनामनी जैसे बच्चों को न केवल चिकित्सा सहायता, बल्कि दीर्घकालिक देखभाल और जागरूकता की भी जरूरत है।
