Jharkhand news: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम विधानसभा चुनाव को लेकर शुक्रवार को बड़ा दांव चला है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) पार्टी अब राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इस मिशन को सफल बनाने के लिए सीएम सोरेन ने चार भरोसेमंद नेताओं को असम में जिम्मेदारी सौंपी है।
राष्ट्रीय विस्तार की रणनीति के तहत JMM कर रही असम पर फोकस

असम विधानसभा चुनाव को लेकर JMM ने गंभीर रणनीति बनाई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पहले अपने विश्वसनीय नेताओं को जमीनी हकीकत जानने के लिए असम भेजा, और इसके बाद उनकी रिपोर्ट के आधार पर ही पार्टी ने चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। यह कदम न केवल चुनावी जीत के लिए है, बल्कि पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की कोशिश भी माना जा रहा है।
नंबर 1: सांसद विजय हांसदा
राजमहल लोकसभा सीट से सांसद विजय हांसदा को इस मिशन की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। राजनीतिक विरासत में उन्हें कांग्रेस से जुड़े अनुभव मिले हैं। बताते चलें कि 2025 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को करीब 18 हजार वोटों से हराकर अपनी मजबूत पकड़ सिद्ध की थी | असम में संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
नंबर 2: विधायक एमटी राजा
राजमहल से विधायक एमटी राजा, जिनका पूरा नाम मोहम्मद ताजुद्दीन है, को अल्पसंख्यक वोटरों को साधने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। 2024 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के अनंत ओझा को 44 हजार मतों से हराया था। असम में मुस्लिम मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ को पार्टी भुनाना चाहती है।
नंबर 3: मंत्री चमरा लिंडा
बिशुनपुर से विधायक और राज्य के कल्याण मंत्री चमरा लिंडा, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के बीच मजबूत पकड़ रखते हैं। उन्होंने पिछले चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को 10 हजार से अधिक वोटों से हराया था। असम के आदिवासी क्षेत्रों में उनकी सक्रियता JMM के लिए लाभकारी साबित हो सकती है।
नंबर 4: विधायक भूषण तिर्की
गुमला से विधायक भूषण तिर्की मुख्यमंत्री के करीबी माने जाते हैं। उन्होंने भाजपा के सुदर्शन भगत को लगभग 26 हजार वोटों से हराया था। आदिवासी समाज में उनकी मजबूत पकड़ को देखते हुए उन्हें असम के ट्राइबल वोट बैंक पर फोकस करने की जिम्मेदारी दी गई है।
JMM की नई राजनीतिक पारी
असम में चुनाव लड़ने का फैसला JMM के लिए एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत है। यह कदम दर्शाता है कि पार्टी अब क्षेत्रीय दायरे से बाहर निकलकर राष्ट्रीय पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। हेमंत सोरेन की यह रणनीति कितनी सफल होती है, यह आने वाले चुनाव परिणाम तय करेंगे।
