जशपुर की पहाड़ियों में एक ऐसा स्थान है, जहां पहुंचते ही शब्द अपने आप धीमे पड़ जाते हैं। ऊंची-सीधी चट्टान, घना जंगल और बीचों-बीच प्रकृति का अद्भुत चमत्कार एक विशाल प्राकृतिक शिवलिंग। महाशिवरात्रि आते ही यहां हर-हर महादेव की गूंज और तेज हो जाती है। छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में स्थित मधेश्वर पहाड़ को लेकर मान्यता भी है और रिकॉर्ड भी, दोनों।
गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है मधेश्वर
जशपुर जिले के मयाली गांव से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित मधेश्वर पहाड़ को ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में विश्व के सबसे बड़े प्राकृतिक शिवलिंग (Largest Natural Facsimile of Shivling) के रूप में दर्ज किया गया है। यह दर्जा मिलने के बाद मधेश्वर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि देशभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है.स्थानीय आदिवासी समाज और आसपास के गांवों के लोग सैकड़ों वर्षों से यहां पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। रविवार को महाशिवरात्रि के मौके पर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगने वाला है।
1924 में हुई थी मंदिर की स्थापना
मधेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना वर्ष 1924 में हुई थी। खास बात यह है कि आज भी यहां पूजा-अर्चना पुजारियों की चौथी पीढ़ी कर रही है। पहले यहां सिर्फ आसपास के जिलों और छत्तीसगढ़ के श्रद्धालु आते थे, लेकिन जैसे ही मधेश्वर को विश्व रिकॉर्ड में स्थान मिला, इसकी पहचान देश के कोने-कोने तक पहुंच गई।
पहाड़ के नीचे रहस्यमयी गुफा
मधेश्वर पर्वत के नीचे एक प्राचीन गुफा है, जिसके भीतर सैकड़ों साल पुराना मंदिर स्थित है। यहां स्वयंभू शिवलिंग रूप में भगवान शिव विराजमान हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस गुफा की गहराई आज तक कोई नहीं नाप सका। कई श्रद्धालु इसे रहस्य और आस्था का संगम मानते हैं।
मन्नतें होती हैं पूरी
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मांगी गई मन्नतें जरूर पूरी होती हैं। खासतौर पर बीमारी से परेशान लोग यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। महाशिवरात्रि पर दूर-दूर से लोग नंगे पांव पहाड़ चढ़ते भी नजर आते हैं।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का खास फोकस
मधेश्वर पर्वत को पर्यटन मानचित्र पर मजबूती से लाने के लिए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की ओर से विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। सीएम स्वयं जशपुर जिले से आते हैं, उनका गांव बगिया भी यहीं स्थित है। यही वजह है कि मधेश्वर के विकास को लेकर सरकार गंभीर नजर आ रही है।
