लेट ना होने का बनाया रिकॉर्ड
जापानी में इस ट्रेन सेवा को शिनकानसेन कहा जाता है जिसकी रफ्तार 300 किमी प्रति घंटे और प्रायोगिक रूप में तो यह 600 किमी प्रति घंटे की गति से चलती है। हालांकि इतने तेज दौड़ाने की जरूरत पड़ती नहीं है। जापान के प्रमुख शहर ओसाका से टोक्यो के बीच दिन में शिनकानसेन के 300 फेरे लगते हैं जो हमेशा अपने समय पर चलती है और कभी कभार पहले लेट हुआ भी होगा तो केवल एक मिनट के अंदर देर होने का ही विश्व रिकॉर्ड रहा है।

भारत से जापान जाता है लोहा
जापान में 1964 से बुलेट ट्रेन चल रही है और मजाल है कभी किसी दुर्घटना में एक भी यात्री की मौत हुई हो। क्योंकि जिन मजबूत पटरियों और पहियों पर यह बुलेट ट्रेन चलती है वह लोहा है भारत देश का इसी मध्यप्रदेश और अब छत्तीसगढ़ का ।
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में बैलाडीला का लौह-अयस्क को सुपर हाई ग्रेड के रूप में जाना जाता है जिसमें 66 प्रतिशत से अधिक लौह सामग्री होती है, जो सल्फर और अन्य हानिकारक सामग्री से मुक्त होती है, और इसमें स्टील बनाने के लिए आवश्यक सर्वोत्तम भौतिक गुण होते हैं।

Bailadila Iron Ore Japan Bullet Train: सालों से हो रहा व्यापार
बैलाडीला लौह खदान छत्तीसगढ़ राज्य के दंतेवाड़ा जिले में स्थित है। बैलाडीला से यह उच्च कोटि का अयस्क रेल लाइन से पहले विशाखापट्टनम जाती है फिर पोर्ट से जहाजों में भर कर पिछले पचास से ज्यादा सालों से जापान को जाता रहा है। इस रेल लाइन में अयस्क का परिवहन ही एकमात्र प्राथमिकता है कि सालों तक इस रेल लाइन पर सवारी गाड़ियां नहीं चलाई गईं ताकि माल पहुंचाने में कोई बाधा न आए। इस अयस्क में से एक ग्राम का हेर फेर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को चैलेंज देना माना जाता रहा है। इस खदान से अयस्क निकालकर विशाखापत्तनम के एक बड़े प्लांट में अशुद्धता को निकालना और जापान के लिए जहाज में लोड करवाने तक का काम भारत की सरकारी राष्ट्रीय मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन के अंदर अलग अलग एजेंसियां करती हैं।
भारत ने दिया जापान का साथ
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान छह और नौ अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों में परमाणु बम गिराया था। जिसके परिणाम स्वरूप वहां के दो लाख चालीस हजार लोगों की मौत हुई। इसके चलते सब तहस-नहस हो गया और जापान की रीढ़ ही टूट गई। लेकिन कोई भी देश जापान की मदद करने सामने नहीं आया था। उस वक्त भारत ने बैलाडीला (बस्तर) का विश्व स्तरीय लौह अयस्क देकर जापान की रीढ़ को मजबूत किया था। जापान स्टेपलर, नेलकटर मोटर गाड़ियों का इंजन, बुलेट ट्रेन, इलेक्ट्रानिक सामान बनाकर विश्व में फिर से सुदृढ़ हुआ है तो इसके पीछे बैलाडीला का लोहा ही है।
14 खदानें केवल जापान के लिए
मार्च 1960 में भारत सरकार एवं जापानी इस्पात मिलों के संगठन के मध्य हुए अनुबंध के तहत ही बैलाडीला से 40 लाख टन कच्चे लोहे का निर्यात जापान किया जाना तय हुआ था। तभी से बस्तर के बैलाडीला के ये 14 खदानें केवल जापान के लिए ही अयस्क निकालता और ट्रेन से लगातार भेजता है।

एक दो सालों में यह अयस्क ट्रेन के बजाय बस्तर से विशाखापत्तनम के रिफाइन प्लांट( जहां अयस्क की सफाई कर मिट्टी और अन्य अपशिष्ट पदार्थ को अलग किया जाता है) तक पानी में घोलकर तरलरूप में पाइप लाइन से भेजने की परियोजना पर वृहद रूप से काम चल रहा है।
‘बस्तर टू जापान ‘ कितना बड़ा अभियान है!
अमेरिका के टैरिफ नीति ने भारत को बैठे बिठाए एक शक्तिशाली व्यापारिक दुश्मन दे दिया है। पिछले भारतीय शासकों ने विश्व की अर्थव्यवस्था में पहले कुछ ऐसे दोस्त बनाए हैं कि हम आज उनके तरफ संकट के दौर में हाथ फैला और गौरव के साथ हाथ बढ़ा भी सकते हैं। हालांकि जापान से दोस्ती और व्यापारिक संबंधों को प्रधानमंत्री ने अहमदाबाद मुंबई बुलेट ट्रेन के साझीदार और अहमदाबाद में जापानी प्रधानमंत्री की आवभगत से उससे थोड़ा और आगे बढ़ाया था।

Bailadila Iron Ore Japan Bullet Train: भारत-जापान संबंध
हाल के वर्षों में, बैलाडीला से विशाखापत्तनम तक अयस्क को तरल रूप में पाइपलाइन के माध्यम से भेजने की परियोजना पर काम चल रहा है। यह परियोजना आपूर्ति को और तेज करेगी। हालांकि, एनएमडीसी जैसे नवरत्न कंपनी के निजीकरण की आशंकाएं भी कुछ लोगों को सता रही हैं। कुछ विश्लेषक इसे नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की रणनीति और खनिज दोहन के निजीकरण से जोड़कर देखते हैं।
रोजगार, अंतरिक्ष जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर
भारत और जापान का रिश्ता केवल अयस्क आपूर्ति तक सीमित नहीं है। हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री की जापान यात्रा के दौरान सेमीकंडक्टर, दवा, रोजगार, अंतरिक्ष, रक्षा, ऊर्जा, और जहाज निर्माण जैसे क्षेत्रों में सात बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन परियोजना में भी जापान भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है। यह रिश्ता दोनों देशों के बीच गहरे विश्वास और सहयोग को दर्शाता है।
