Internet Bhakti – आस्था या पाखंड?
आजकल सोशल मीडिया का चलन जोरों पर है। हर व्यक्ति प्रसिद्धि पाने के लिए सोशल मीडिया पर नित नए हथकंडे अपनाता रहता है। इसी प्रसिद्धि की दौड़ में आज के युवा इंटरनेट भक्ति की रीलें बनाकर धड़ल्ले से अपलोड कर रहे हैं और यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि भक्ति और आस्था का झंडा उन्हीं के हाथों में है।
आस्था के नाम पर, जिसका जो मन कर रहा है, वह उसकी रील बना रहा है। यह आस्था नहीं है, बल्कि सस्ती लोकप्रियता पाने की होड़ है, जिसमें content creation के नाम पर इंटरनेट पर भक्त इन्फ्लुएंसर दिखाई दे रहे हैं। हमारा धर्म हमें बहुत आज़ादी देता है, पर इसका यह कतई मतलब नहीं है कि कोई भी व्यक्ति भक्ति के नाम पर फूहड़ और अशोभनीय रीलें बनाए।
दुनिया को दिखाया जा रहा है कि कैसे हमने परंपरा और रीति-रिवाजों के नाम पर खुद का ही मज़ाक बना रखा है।
सावन आया, तो कांवड़ यात्रा के नाम पर इन तथाकथित भक्ति इन्फ्लुएंसर्स ने कांवड़ का मज़ाक बना दिया। कांवड़ लाना बहुत श्रद्धा का काम होता है और इसके कुछ सख्त नियम होते हैं, जिन्हें कांवड़ियों को पालन करना होता है। लेकिन रील बनाने की होड़ में सारे नियमों को ताक पर रखकर कोई नेता की कांवड़ उठा रहा है, तो कोई अपनी गर्लफ्रेंड की कांवड़ उठा रहा है।
केवल दिखावे और रील बनाने के लिए कांवड़ उठाई जा रही है, अश्लील नृत्य किए जा रहे हैं। नए भारत के युवा, शिव भक्ति के नाम पर गुंडागर्दी, नशेबाज़ी, और महीने भर मौज-मस्ती में लगे हुए हैं।
जन्माष्टमी आई, तो भगवान कृष्ण के नाम पर लड्डू गोपाल को खिलौना बना दिया गया। माधव की नई-नई कहानियां बनाई जा रही हैं—कोई कृष्ण को ब्यूटी पार्लर ले जा रहा है, कोई उन्हें स्कूल ले जाकर उनकी मार्कशीट ला रहा है। जिस कृष्ण ने दुनिया को भगवद गीता का ज्ञान दिया, उसी का सरेआम अपमान किया जा रहा है।
सभी मर्यादाओं को दरकिनार कर दिया
देश में एक नया चलन शुरू हो गया है लोगों ने तीर्थस्थलों को भी टूरिज़्म बना दिया है। केदारनाथ, महाकाल, ऋषिकेश, कुंभ आदि स्थानों पर फूहड़ रीलें बनाई जा रही हैं, अश्लील नृत्य हो रहे हैं। इन स्थानों की अपनी पवित्रता है, पर सभी मर्यादाओं को दरकिनार कर इन्हें टूरिस्ट स्पॉट बना दिया गया है।
धर्म के नाम पर यह ‘ज्ञान’ देते हैं
केवल हिन्दू क्रिएटर्स ही नहीं, कुछ मुस्लिम क्रिएटर्स भी धर्म के नाम पर यह ‘ज्ञान’ देते हैं कि लड़कियों के साथ छेड़छाड़ इसलिए होती है क्योंकि वे बुर्का नहीं पहनतीं। वहीं कुछ क्रिश्चियन क्रिएटर्स पंजाबी और अब तो भोजपुरी क्रिश्चियन गानों पर रील्स बना रहे हैं। गायत्री मंत्र को बदलकर येशु गायत्री मंत्र बना दिया गया है, और उस पर रीलें बनाई जा रही हैं।
आस्था का स्थान हृदय में होता है, दिखावे में नहीं। धर्म को डिजिटल मज़ाक बनाने की यह प्रवृत्ति न केवल परंपराओं का अपमान है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी ठेस पहुंचा रही है। सोशल मीडिया की ताकत को समझना ज़रूरी है, लेकिन उससे खिलवाड़ नहीं।
