गलवान से बालाकोट तक लड़ीं महिलाएं, फिर भी सेना में भेदभाव!

हमने हर मोर्चे पर साथ दिया, पर सेना ने हमें बराबरी नहीं दी!
Indian Army Women Permanent Commission case: सेना सिर्फ एक नौकरी नहीं, जीवन है। और जब इस जीवन में आप पूरी शिद्दत से सब कुछ झोंक दें – युद्ध, सीमा, और बलिदान – तो बदले में आपको बराबरी मिलनी चाहिए।
ये कोई भावुक बयान नहीं,
बल्कि भारत की उन बहादुर महिला अफसरों की हकीकत है जो सालों तक देश की सीमाओं पर डटी रहीं, ऑपरेशन्स में भाग लिया, लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट में खड़ी होकर कह रही हैं – हमें परमानेंट कमीशन (Permanent Commission) से वंचित रखा गया, क्योंकि हम महिलाएं हैं।
सुप्रीम कोर्ट में क्या है मामला?
24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में सेना की शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की 13 महिला अफसरों की याचिका पर सुनवाई हो रही है। इन अफसरों का आरोप है कि उन्हें पुरुष अफसरों के बराबर स्थायी कमीशन नहीं मिला, जबकि उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर हर बड़े सैन्य ऑपरेशन में भाग लिया।
कोर्ट की बेंच: जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह
सरकार की ओर से पक्ष: एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी
महिला अफसरों की बड़ी आपत्तियाँ
- ACR (वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट) में भेदभाव
- पुरुष अफसरों की पोस्टिंग और ‘क्राइटेरिया अपॉइंटमेंट्स’ ACR में दर्ज होती हैं।
- महिला अफसरों की वही पोस्टिंग होने के बावजूद रिपोर्ट में ज़िक्र नहीं।
- सेवा में समान योगदान, लेकिन मौका नहीं
- गलवान, बालाकोट, ऑपरेशन सिंदूर जैसे मिशनों में इन अफसरों की भूमिका अहम रही, फिर भी परमानेंट कमीशन से वंचित रखा गया।
- SC के आदेशों की अनदेखी
- 2020 के बबीता पुनिया केस और 2021 के निशिता केस में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को बराबरी का हक़ देने का निर्देश दिया था।
- लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार वैकेंसी नहीं है जैसे बहाने बनाकर इन आदेशों को टाल रही है।
महिला अफसरों का ज़मीनी योगदान
इन महिलाओं ने सिर्फ टेबल जॉब नहीं की – इन्होंने देश के सबसे कठिन ऑपरेशनों में जान जोखिम में डालकर सेवा की:
- ले. कर्नल वनीता पाधी: कांगो में UN मिशन + फिरोजपुर बॉर्डर कमांडर
- ले. कर्नल चांदनी मिश्रा: पहली महिला MEAT पायलट, 88 देशों में उड़ान
- ले. कर्नल गीता शर्मा: गलवान ऑपरेशन में कम्युनिकेशन यूनिट की कमान
- ले. कर्नल स्वाति रावत: ऑपरेशन सिंदूर, जम्मू-कश्मीर काउंटर इंसरजेंसी ऑपरेशन
क्या इनके योगदान को अनदेखा किया जाना जायज़ है?
कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान बेंच ने भी गंभीर चिंता जताई और साफ कहा
जब ट्रेनिंग और पोस्टिंग दोनों एक जैसी हैं, तो मूल्यांकन में दो अलग मापदंड कैसे?
क्राइटेरिया अपॉइंटमेंट्स पुरुषों के लिए ACR में हैं, महिलाओं के लिए नहीं – ये कैसे स्वीकार्य है?
कानून बनाम जमीनी हकीकत
भारत की सबसे बड़ी अदालत कह चुकी है कि सेना में महिलाओं को बराबरी का हक़ मिलना चाहिए। फिर क्यों ऐसा लगता है जैसे ज़मीनी स्तर पर आज भी पुराने सोच वाले सिस्टम को ढोया जा रहा है?
2020 – बबीता पुनिया केस: SC ने कहा – महिलाओं को परमानेंट कमीशन से वंचित रखना असंवैधानिक है।
2021 – निशिता केस: SC ने केंद्र को निर्देश दिया – महिलाओं को समान अवसर दो।
लेकिन अब 2025 में वही महिलाएं फिर कोर्ट के दरवाज़े खटखटा रही हैं।

