बाढ़, भूस्खलन और आंसू: आसमान से बरसी तबाही, ज़मीन ने निगल लिए घर-परिवार
एक मां के आंसू और एक बच्चे की चीखें… शायद यही सबसे सच्चा बयान है उस तबाही का, जो इन दिनों भारत के कई राज्यों को जकड़े हुए है। पहाड़ दरक रहे हैं, नदियां उफान पर हैं, खेत डूब रहे हैं और गांव उजड़ रहे हैं। ये सिर्फ मौसम नहीं है, ये एक त्रासदी है… जो टीवी की हेडलाइन नहीं, लाखों परिवारों की सच्चाई बन गई है।

हिमाचल: जहां पहाड़ खुद रो पड़े…
हिमाचल प्रदेश की वादियों में इस बार सैलानियों की हँसी नहीं, 366 मौतों की ख़ामोशी गूंज रही है। जुलाई से अगस्त तक के इस मानसून सीजन ने राज्य को ऐसा जख्म दिया है जिसकी भरपाई आसान नहीं।
₹4.07 लाख करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ है —
सेब के बागान बर्बाद, घर बह गए, और रास्ते अब सिर्फ मलबे से भरे हैं।
शिमला और कुल्लू —
दो ऐसे जिले जहां इस बार दोगुनी बारिश हुई। शिमला में 113% और कुल्लू में 116% ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई। और ये ‘ज्यादा’ सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि उन लोगों की तकलीफ है जो हर दिन जान और ज़िंदगी के बीच झूल रहे हैं।
शिमला-
ठियोग-रोहड़ू नेशनल हाईवे दो दिन से बंद है। 400 से ज्यादा वाहन, जिनमें किसानों के सेब लदे ट्रक भी शामिल हैं, फंसे हुए हैं। एक किसान ने कहा – सेब तोड़ लिए थे, अब पता नहीं मंडी पहुंचेंगे या सड़ जाएंगे।
पंजाब: हर गांव में पानी, हर चेहरे पर डर
23 जिले, 1996 गांव, 3.87 लाख लोग… ये कोई आंकड़े नहीं, पंजाब के जख्म हैं। बाढ़ से हर चौथा गांव पानी में डूबा है।
लुधियाना का ससराली बांध खतरे में है। अगर यह टूटा, तो सतलुज के आसपास के इलाकों में तबाही रुकने वाली नहीं।
लोगों को राहत शिविरों में पहुंचाया गया है, लेकिन एक बुजुर्ग महिला की आंखों में डर अब भी है – पिछली बार जब पानी आया था, हम छत पर थे। अब डर है कि अगली बार छत भी साथ ले जाएगी।
46 लोगों की मौत, और हजारों की फसलें डूब चुकी हैं। गांव के गांव खाली हो गए हैं। राहत तो मिल रही है, लेकिन हर बार ये सवाल रह जाता है – कब तक ऐसे ही?
उत्तराखंड: जब बादल नहीं फटा, ज़िंदगी फट गई
उत्तरकाशी के नौगांव में शनिवार को जो बादल फटा, उसने सिर्फ घर नहीं उजाड़े — कई सपने भी बहा ले गया। मलबा बाजारों में घुसा, गाड़ियां सड़क से सीधे नाले में पहुंच गईं।

एक दुकानवाले ने रोते हुए कहा – जो कमाया था, सब चला गया… अब शुरुआत कहां से करें?
दिल्ली से गुजरात तक – एक ही कहानी, अलग-अलग चेहरों से
- दिल्ली में यमुना खतरे के निशान से ऊपर है। मयूर विहार जैसे इलाकों में घरों में पानी घुस गया है।
- गुजरात में साबरमती रिवरफ्रंट डूब गया। 7 जिलों में रेड अलर्ट है।
- राजस्थान में हाईवे बह गया, मकान ढह गए। सेना और SDRF को रेस्क्यू में उतारना पड़ा।
सिस्टम की नाकामी है
सवाल यह नहीं है कि इतनी बारिश क्यों हुई। सवाल यह है कि इतने सालों में हमने तैयारी क्यों नहीं की? क्यों आज भी गांवों में बांध टूटते हैं, क्यों शहरी नालियां भर जाती हैं, क्यों किसानों के पास बीमा के नाम पर सिर्फ कागज़ होता है?

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