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सस्ता तेल, भारी सियासत: रूस से रिश्ते क्यों टकरा गए ट्रम्प के टैरिफ से?

Shital Sharma October 2, 2025

India Cuts Russian Oil Import After Trump Tariff Hike

जब तेल सिर्फ तेल नहीं रहा… एक देश की मजबूरी, दूसरी की राजनीति

india cuts russian oil import: सितंबर 2025 की शुरुआत में जब डेटा एजेंसी केप्लर की रिपोर्ट सामने आई, तो एक बात साफ़ हो गई, तेल की धार अब राजनीति की दिशा से बहती है। भारत की सरकारी कंपनियों ने रूस से कच्चे तेल की खरीद 32% घटा दी। अगस्त के मुकाबले ये कटौती छोटी नहीं थी, बल्कि एक सीधा संदेश…. अमेरिका की नज़र हम पर है।

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इस बदलाव की बड़ी वजह बनी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की 50% टैरिफ की धमाकेदार वापसी, जो सीधे भारत की तेल नीति को झटका दे गई।

पब्लिक सेक्टर पीछे हटा, प्राइवेट कंपनियां आगे बढ़ीं

BPCL और IOC, जिनका काम देश के घरों तक तेल पहुंचाना है, उन्होंने रूस से तेल लेना घटा दिया। लेकिन रिलायंस और नायरा, जो निजी कंपनियां हैं, उन्होंने इसी दौरान रूस से अपनी खरीद 8% तक बढ़ा दी।

क्यों?

क्योंकि उनके लिए तेल सिर्फ ईंधन नहीं, मुनाफे का जरिया है। सस्ते रूसी तेल से रिफाइन करके वे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उत्पाद बेचते हैं और बड़े लाभ कमाते हैं।

सियासत का सीधा असर आम जेब पर

अगर आप सोच रहे हैं कि ये सब ऊँचे स्तर की बातें हैं

तो ज़रा सोचिए, जब सरकारी कंपनियां सस्ता तेल कम खरीदेंगी, तो घरेलू सप्लाई घटेगी, और फिर पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें बढ़ेंगी। 2023-24 में IOC, BPCL और HPCL ने 86,000 करोड़ का मुनाफा कमाया था। क्योंकि रूस से सस्ता तेल मिल रहा था। लेकिन जैसे ही टैरिफ बढ़ा, और आयात घटा, 2024-25 में ये मुनाफा 33,602 करोड़ पर आ गया। यानी आम आदमी की टंकी भरने की कीमत और सरकार की जेब — दोनों पर असर।

क्या अमेरिका हमें अपनी लाइन पर लाना चाहता है?

ट्रम्प ने साफ कहा- अगर आप रूस से तेल खरीदेंगे, तो अमेरिका जवाब देगा। 50% टैरिफ में 25% सीधा रूस से व्यापार की पेनल्टी है। ऐसे में भारत जैसे देश के लिए ये एक दोराहा बन गया है एक तरफ सस्ता तेल, जो मुनाफा और जनता की राहत है। दूसरी तरफ अमेरिकी दबाव, जो रणनीतिक रिश्तों की नींव हिला सकता है।

रूस का दावा: हमारा तेल बेमिसाल है

रूस के सीनियर डिप्लोमैट रोमन बाबुश्किन ने अगस्त में कहा था

भारत को हमारे तेल पर 5% की छूट मिलती है, इसका कोई विकल्प नहीं है।

लेकिन अब हालात बदलते दिख रहे हैं। सप्लाई डायवर्सिफिकेशन यानी तेल के लिए नए स्रोत तलाशना अब भारत की रणनीति का हिस्सा है — चाहे उसके पीछे दबाव हो या भविष्य की सोच।

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सवाल अब तेल का नहीं, नीति का है

तेल की हर बूँद अब सिर्फ ईंधन नहीं — राजनीति, रणनीति और राष्ट्रीय स्वाभिमान का हिस्सा बन चुकी है। सरकारी कंपनियां पीछे हटीं क्योंकि वो जनता के लिए जिम्मेदार हैं। प्राइवेट कंपनियां आगे बढ़ीं क्योंकि वो लाभ के लिए उत्तरदायी हैं। और अमेरिका का ट्रम्प कार्ड अब भारत के फैसलों पर असर डालने लगा है।

अब अगला सवाल हमसे है क्या हम अमेरिका की बात मानेंगे, या सस्ती डील रूस से जारी रखेंगे?

या फिर कोई तीसरा रास्ता तलाशेंगे, जो देश के हित और प्रतिष्ठा दोनों को बचा सके?

आपका क्या मानना है?

क्या भारत को रूस से तेल लेना जारी रखना चाहिए, या अमेरिका से रिश्ते बेहतर करने के लिए समझौता करना चाहिए? नीचे कमेंट में अपनी राय ज़रूर साझा करें।

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i am contant writer last 10 Years, worked with Vision world news channel, Sadhna News, Bharat Samachar and many web portals.

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