
कुछ दिन पहले की बात है। जुलाई का पहला हफ्ता था। दोपहर के तीन बजे का समय होगा। मैं अपने कमरे में बैठा था, पंखा पूरी रफ्तार से चल रहा था, फिर भी लग रहा था जैसे गर्म हवा सीधे चेहरे पर पड़ रही हो। एसी चलाना पड़ा, लेकिन दिल से एक अजीब सी बेचैनी जा ही नहीं रही थी। तभी फोन बजा मम्मी की पुरानी सहेली की बेटी, सीमा, अस्पताल में भर्ती थी। कारण? हीट स्ट्रोक।
सीमा की उम्र रही होगी मुश्किल से 32 साल। फिट, एक्टिव, हर सुबह पार्क में दौड़ने जाती थी। लेकिन उस दिन, तेज धूप में थोड़ा ज़्यादा वक्त क्या बिताया, हालत बिगड़ गई। तेज़ बुखार, उल्टी, होश खो दिया। डॉक्टरों ने बताया कि शरीर का तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। कई अंगों पर असर पड़ा।
ये पहली बार नहीं है जब मैंने हीटवेव की वजह से किसी को परेशान होते देखा हो। लेकिन इस बार कुछ अलग था एक झटका, एक डर, और एक सवाल: क्या अब मौसम भी हमारी जान का दुश्मन बन चुका है?
हीटवेव नाम तो सुना था, असर अब समझ आया
हमारे देश में गर्मी नई बात नहीं है। लेकिन अब जो गर्मी पड़ती है, वो सीधी नसों तक उतरती है। पहले जो 38 डिग्री लगता था “गर्म”, अब वो 45 के पार जाकर ही मानो अपना रंग दिखाता है। और ये सिर्फ भारत की बात नहीं यूरोप तक में, जहाँ लोग 30 डिग्री को ‘हिट वेव’ मानते थे, अब 46 डिग्री तक तापमान पहुंच गया है।
हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ी। बताया गया कि 23 जून से 2 जुलाई के बीच यूरोप की 12 प्रमुख शहरों में लगभग 2,300 लोग मारे गए केवल गर्मी से। सोचिए ज़रा, न कोई बाढ़, न भूकंप, न हादसा… सिर्फ गर्मी। पर सबसे डरावनी बात ये थी इन मौतों में से 1,500 के करीब मौतें वो थीं जो शायद जलवायु परिवर्तन न होता तो टाली जा सकती थीं।
हम अब भी पूछते हैं 30 डिग्री से 33 हुआ तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?
मैं खुद कभी-कभी यही सोचता था। गर्मी तो हर साल पड़ती है, इसमें नया क्या है? लेकिन अब महसूस हो रहा है कि बदलाव की रफ्तार ज़्यादा है, और हमारी तैयारी बेहद कम।
हीटवेव कोई अचानक आने वाली आपदा नहीं है, लेकिन फिर भी हम हर बार इससे अचंभित हो जाते हैं। हमारे शहरों में छांव नहीं बची, पानी की कमी है, और बिजली कटौती आम बात हो गई है। जो लोग दिन भर बाहर काम करते हैं रिक्शा चालक, मजदूर, डिलीवरी बॉय उनके लिए ये गर्मी जानलेवा बन चुकी है।
क्या कहती है साइंस?
इस नई रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बहुत ही अहम काम किया है। उन्होंने कुछ ऐसा किया जो पहले कभी इतने जल्दी नहीं हुआ हीटवेव के खत्म होते ही, मात्र एक हफ्ते में ये बताना कि इसमें जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका थी।
उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन ने इस हीटवेव को 1°C से 4°C तक ज़्यादा गर्म बना दिया। अब 4 डिग्री का फर्क सुनने में भले छोटा लगे, पर शरीर के लिए ये अंतर जानलेवा हो सकता है।
अब क्या करें?
इसका जवाब आसान नहीं है, लेकिन शुरुआत तो करनी ही होगी।
- सबसे पहले, हीटवेव को गंभीरता से लेना शुरू करें। ये कोई मामूली ‘गर्म दिन’ नहीं होते।
- सरकारी स्तर पर हीट एक्शन प्लान बनने चाहिए, और आम लोगों तक उसकी जानकारी भी पहुंचनी चाहिए।
- स्कूलों, दफ्तरों, और फैक्ट्रियों को चाहिए कि ऐसी परिस्थितियों में लचीलापन दिखाएं।
- और हम सब, अपने स्तर पर, दूसरों का ख्याल रखें। खासकर बुजुर्गों, बच्चों, और उन लोगों का जो घर से बाहर काम करते हैं।
सीमा अब ठीक है। कई दिन ICU में रहने के बाद, धीरे-धीरे रिकवरी कर रही है। लेकिन उसकी मां की आवाज़ अब भी मेरे कानों में गूंजती है: “बिटिया तो सिर्फ दौड़ने ही गई थी… गर्मी ने क्या बिगाड़ा उसका?”
गर्मी अब सिर्फ मौसम नहीं रही। ये एक ‘साइलेंट किलर’ है, जो धीरे-धीरे, चुपचाप, ज़िंदगियां निगल रही है।
