Gwalior Markandeshwar Temple: ग्वालियर का मार्कंडेश्वर मंदिर 350 साल से अधिक पुराना है और यह श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां भगवान भोलेनाथ और मृत्यु के देवता यमराज की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस मंदिर में यमराज की पूजा करने से व्यक्ति को मृत्यु के बाद यमलोक की यात्रा में होने वाले कष्ट कम होते हैं और पापों से मुक्ति मिलती है।
मार्कंडेय ऋषि की कथा और मंदिर का इतिहास…
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि, मार्कंडेय ऋषि भोलेनाथ के अत्यंत भक्त थे। जब यमराज उन्हें लेने आए, तो ऋषि ने शिवलिंग को पकड़ा और अपनी भक्ति दिखाई। इससे प्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उन्हें सप्तयुग का जीवन वरदान दिया और यमराज को खाली हाथ लौटना पड़ा।

इसके बाद शिवलिंग का नाम मार्कंडेश्वर महादेव पड़ गया। बाद में सिंधिया राजवंश के समय संत राव तेमक ने यमराज की स्थापना करवाई, क्योंकि उन्हें संतान प्राप्ति के लिए कहा गया था कि मंदिर बनवाने से उनकी मन्नत पूरी होगी।

मकर संक्रांति और नरक चौदस पर होती है विशेष पूजा…
मंदिर में यमराज की पूजा विशेष रूप से मकर संक्रांति और नरक चौदस के दिन की जाती है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है और सभी मांगलिक कार्य शुभ माने जाते हैं। इस दिन की पूजा से यमराज प्रसन्न होते हैं और मृत्यु के बाद आत्मा को यमलोक ले जाने में आने वाले कष्ट कम हो जाते हैं।

यमराज की पूजा से मुक्ति और राहत…
पंडित मनोज भार्गव बताते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में छोटे-बड़े पाप होते हैं। मृत्यु के बाद जब यमदूत व्यक्ति को यमलोक ले जाते हैं, तो उसके पापों के अनुसार आत्मा को यातनाएं झेलनी पड़ती हैं। यमराज की पूजा से यह यात्रा आसान बनती है और यमलोक में पहुँचने पर गलतियों को माफ कर स्वर्ग की प्राप्ति संभव होती है।

मकर संक्रांति पर दान और काला चढ़ावा…
मकर संक्रांति के दिन मंदिर में विशेष दान और काला चढ़ावा का महत्व होता है। इसमें गुड़, उड़द की दाल, काले तिल, काले कपड़े या कंबल, छाता, खड़ाऊं, डंडा आदि चढ़ाए जाते हैं। इसके अलावा चांदी, सरसों का तेल, शक्ति भोग, गजग या तिल से बनी मिठाई अर्पित की जाती है।
