परंपरा और एकता का अनूठा संगम
छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का गीदम नगर धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वर्षों से मिसाल कायम करता आया है। यहां 87 वर्षों से सार्वजनिक गणेशोत्सव पूरी श्रद्धा, उल्लास और भाईचारे के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व न केवल धार्मिक आयोजन है, बल्कि सामाजिक एकता और सद्भाव का प्रतीक भी बन गया है।
हिंदू-मुस्लिम एकता की ज़िंदा मिसाल
गणेशोत्सव गीदम में केवल हिंदू समाज का आयोजन नहीं है, बल्कि इसमें मुस्लिम समाज की गहरी भागीदारी भी शामिल है। यही इसे बाकी आयोजनों से अलग बनाता है। मुस्लिम समुदाय न केवल आयोजन में भाग लेता है, बल्कि कई वर्षों तक उन्होंने गणेश प्रतिमा निर्माण, सांस्कृतिक आयोजनों और व्यवस्थाओं में भी नेतृत्व किया है।
मुस्लिम परिवारों की ऐतिहासिक भूमिका
करीब 30 वर्षों तक पठान पारा के मुस्लिम परिवार गणेश प्रतिमा निर्माण की ज़िम्मेदारी निभाते रहे। इसके साथ ही, पिछले 15 वर्षों से सांस्कृतिक प्रमुख साजिद भारती खान आयोजन की रूपरेखा तैयार करते आ रहे हैं। भजन-कीर्तन जैसे धार्मिक आयोजनों में भी भक्कु खान और छोटे खान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जो भाईचारे की गहराई को दर्शाती है।
सांस्कृतिक मंच और गीदम की पहचान
गणेशोत्सव के दौरान गीदम का कला मंच पूरे बस्तर संभाग में प्रसिद्ध रहा है। वरिष्ठ नागरिक विमल सुराना बताते हैं कि एक समय था जब जगदलपुर, दंतेवाड़ा और बारसूर जैसे स्थानों से कलाकार यहां प्रदर्शन करने आते थे। आज भी यह परंपरा बरकरार है और स्थानीय युवा इस मंच को आगे बढ़ा रहे हैं।
नई पीढ़ी निभा रही है ज़िम्मेदारी
समिति के सदस्य शेख नसीम अब भी स्कूलों में जाकर बच्चों को मंचीय प्रस्तुतियों के लिए प्रशिक्षित करते हैं। अनिल जॉर्ज, जो पहले समिति के कोषाध्यक्ष थे, अब संरक्षक के रूप में मार्गदर्शन दे रहे हैं। युवा पीढ़ी भी इस आयोजन को उसी श्रद्धा और ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा रही है, जैसे पुरानी पीढ़ियां करती रहीं।
गणेशोत्सव 2025: 5 दिवसीय विशेष कार्यक्रम
इस वर्ष गणेश चतुर्थी के अवसर पर पुराना बाज़ार पारा, गीदम में गणेश प्रतिमा की स्थापना की गई है। आयोजन के 5 दिवसीय कार्यक्रम में स्थानीय विद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं और कलाकारों की भागीदारी हो रही है।
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