Gaivinath Dham Shivling Story: गैवीनाथ धाम बिरसिंहपुर कस्बे में स्थित है, जो सतना जिले से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। यह मंदिर विशेष रूप से खंडित शिवलिंग की पूजा के लिए जाना जाता है। यह शिवलिंग स्वयंभू है, अर्थात् यह किसी मानव द्वारा स्थापित नहीं किया गया, बल्कि यह स्वयं भूमि से प्रकट हुआ है। इसका वर्णन पाताल पुराण में भी मिलता है, और इसे उज्जैन महाकाल का दूसरा उपलिंग माना जाता है। इस मंदिर में एक ओर मां पार्वती विराजमान है वहीं दूसरी ओर शिविलिंग और बीच में तलाब है, दोनों की गांठ धागो द्वारा जोड़ी गई है।
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खंडित शिवलिंग की पूजा की मान्यता..
गैवीनाथ धाम में पूजा जाने वाला शिवलिंग खंडित है, और यह पूजा का एक अद्वितीय रूप प्रस्तुत करता है। मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है और इसकी पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यहां जलाभिषेक करने से पुण्य की प्राप्ति होती है, और इसे चारों धामों के दर्शन के समान माना जाता है।
पौराणिक कथा और इतिहास..
कहा जाता है कि बिरसिंहपुर नगर में एक गैवी यादव नामक युवक के घर के चूल्हे से रात को शिवलिंग रूप में एक आकृति प्रकट होती थी। गैवी यादव की मां उसे मुसल से ठोक कर वापस अंदर कर देती थी, लेकिन वह रोज रात को बाहर आ जाता था। इस कारण शिवलिंग खंडित हो गया, और इस स्थान का नाम गैवीनाथ धाम पड़ा।
राजा वीर सिंह और महाकाल की भक्ति…
यह कथा राजा वीर सिंह से जुड़ी है, जो देवपुर क्षेत्र के शासक थे। राजा वीर सिंह उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के परम भक्त थे। अपने राज्य कार्यों के बावजूद वे नियमित रूप से घोड़े पर सवार होकर सैकड़ों किलोमीटर दूर उज्जैन जाकर भगवान महाकाल के दर्शन करते थे। वर्षों तक यह क्रम चलता रहा।
लेकिन समय के साथ जब राजा वृद्ध हो गए और उनकी शारीरिक शक्ति कम हो गई, तब उनके लिए उज्जैन जाना कठिन हो गया। इस पीड़ा को लेकर उन्होंने महाकाल से प्रार्थना की कि अब वह उनकी भक्ति में विघ्न नहीं आने दें।

स्वप्न में दर्शन और शिवलिंग का प्रकट होना
राजा वीर सिंह को एक रात स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए। महाकाल ने उन्हें बताया कि अब वह स्वयं देवपुर में ही प्रकट होंगे और उन्हें उज्जैन तक जाने की आवश्यकता नहीं होगी। यही नहीं, उन्होंने यह भी बताया कि वे एक स्थान पर चूल्हे से बाहर आने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन गैवी नामक व्यक्ति की मां उन्हें वापस जमीन में धकेल देती है।
मंदिर का कराया निर्माण..
अगली सुबह राजा तुरंत उस स्थान पर पहुंचे जहां गैवी यादव अपने घर में चूल्हे पर खाना बनाते थे। उन्होंने देखा कि वास्तव में वहां से एक शिवलिंग बाहर निकलने की चेष्टा कर रहा है। राजा ने यह सब देखकर उसे चमत्कार माना और उसी स्थान पर एक भव्य मंदिर के निर्माण का आदेश दिया।
गैवी यादव के नाम पर ही भगवान शिव को यहां गैवीनाथ कहा गया। यहीं पर भगवान शिव के खंडित रूप में स्थित शिवलिंग को महाकाल का ही स्वरूप माना गया है। हालांकि यह शिवलिंग खंडित है, फिर भी इसकी विधिवत पूजा होती है जो शास्त्रों के सामान्य नियमों से बिल्कुल अलग है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, विदेशी आक्रमणकारियों ने इस शिवलिंग को खंडित करने का प्रयास किया, लेकिन हर बार शिवलिंग से चमत्कारी घटनाएं घटीं, जैसे दूध, खून, मवाद, फूल, बेल पत्र और जीव-जंतु निकलना। इन घटनाओं के बाद आक्रमणकारी भाग गए।

धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव..
गैवीनाथ धाम में विशेष अवसरों पर धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव आयोजित किए जाते हैं। सावन माह, महाशिवरात्रि और पुरुषोत्तम माह में यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। इन अवसरों पर लाखों की संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक और पूजा के लिए आते हैं। यहां की विशेषता यह है कि यहां खंडित शिवलिंग की पूजा होती है, जो अन्य शिवालयों से इसे अलग बनाती है।
मंदिर की संरचना और दर्शन..
यह मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मंदिर परिसर में एक कुंड है, जिसके एक छोर पर महादेव विराजमान हैं और दूसरे छोर पर माता पार्वती की प्रतिष्ठा है। यहां के दर्शन करने से भक्तों को मानसिक शांति और आंतरिक संतुलन की प्राप्ति होती है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां की पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गैवीनाथ धाम में विशेष पूजा और मेला..
गैवीनाथ धाम में विशेष अवसरों पर पूजा और मेला आयोजित किए जाते हैं। इन अवसरों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां के मेले में धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन, और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जो भक्तों को आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं। यहां का वातावरण भक्तिमय और उल्लासपूर्ण होता है।

कैसे पहुंचे गैवीनाथ धाम…
गैवीनाथ धाम बिरसिंहपुर कस्बे में स्थित है, जो सतना जिले से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। यहां तक पहुंचने के लिए सतना से टैक्सी या निजी वाहन का उपयोग किया जा सकता है। स्थानीय परिवहन सुविधाएं भी उपलब्ध हैं, जो श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचने में सहायता करती हैं।
