आगरा में 40 गांव डूबे; हिमाचल में बाढ़-बारिश से अब तक 380 की मौत
प्रकृति के गुस्से से कभी-कभी ऐसा संकट आता है, जिसे हम शब्दों में भी नहीं ढाल सकते। पिछले कुछ हफ्तों में भारत के कई हिस्सों में आई बाढ़ और लैंडस्लाइड ने ना सिर्फ़ लाखों लोगों की जिंदगी छीन ली, बल्कि यह हमें हमारी नाजुकता और इंसानियत की याद भी दिला दी। सोचिए, जब बारिश का पानी आपके घर में घुसने लगे, जब जमीन आपके पैरों के नीचे से खिसकने लगे, तो उस पल के दर्द का क्या हाल होता होगा?
बाढ़, लैंडस्लाइड और लोगों की जिंदगियां
सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में आई बाढ़ और लैंडस्लाइड ने इंसानियत की परीक्षा ली है। सिक्किम में यांगथांग के अपर रिंबी इलाके में रातोंरात आए लैंडस्लाइड में चार लोगों की जान चली गई, जबकि तीन लोग अभी भी लापता हैं। यह सिर्फ़ आकड़ों की बात नहीं है, यह उन लोगों के परिवारों के दर्द की कहानी है, जिन्होंने अपनी जान गंवाई, अपने घर गंवाए। वही हाल उत्तर प्रदेश के आगरा में भी है, जहां यमुना नदी ने बाढ़ का रूप ले लिया। 47 साल बाद इतनी बड़ी बाढ़ आई है, और ताजमहल के पास के पार्क तक डूब गए हैं। यह सब देखने वालों के लिए वाकई हैरान करने वाला था।
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लेकिन इन मुश्किलों के बीच भी इंसानियत की उम्मीद न कभी खत्म होती है, न कभी खत्म होनी चाहिए। राहत शिविरों में शरण लिए हजारों लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर मदद कर रहे हैं। बाढ़ के पानी से फंसे हुए लोगों को बाहर निकालने के लिए दिन-रात एक कर दी जाती है। एक-दूसरे की मदद में ही तो असली ताकत है। और यही ताकत हमें मुसीबतों से उबारने का एक रास्ता दिखाती है।

क्या हमें इससे कुछ सीखने की जरूरत है?
बेशक, हम नहीं चाहते कि प्रकृति हमें इस तरह से अपनी ताकत दिखाए, लेकिन जब ऐसा होता है, तो हम इंसानियत का सहारा लेते हैं। इस संकट से एक और बात साफ होती है: हमें अपनी तैयारियों को बेहतर बनाना होगा। बाढ़ की चेतावनी, लैंडस्लाइड्स, और आपातकालीन बचाव कार्यों के लिए एक बेहतर और तेज़ प्रतिक्रिया प्रणाली की जरूरत है। साथ ही, हमें जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी भी समझनी होगी।
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