election commission new rule: कांग्रेस बोली‑ यह लोकतंत्र पर हमला!
election commission new rule चुनाव आयोग का नया नियम और विवाद
1. नया नियम क्या है?
चुनाव आयोग (Election Commission of India) ने हाल ही में एक बड़ा और विवादास्पद निर्देश जारी किया है। इसके अनुसार, चुनाव के दौरान खींची गई फोटो, CCTV फुटेज, वेबकैस्टिंग और वीडियो रिकॉर्डिंग केवल 45 दिन तक ही सुरक्षित रखी जाएंगी, उसके बाद ये डेटा डिलीट कर दिया जाएगा।
यदि 45 दिनों के अंदर किसी भी विधानसभा/लो कसभा चुनाव के नतीजे को कोर्ट में टाला नहीं गया, तो सारे रिकॉर्ड साफ़-साफ़ मिट जाएंगे।
2. नियम क्यों लागू किया गया?
EC का आरोप है कि हाल ही में अनेक गैर-उम्मीदवारों द्वारा चुनावी फुटेज का “टुकड़े-टुकड़े” करके गलत नरेटिव फैलाया जा रहा था, जिससे बट्टा भ्रम और झूठी ख़बरें वायरल होती हैं।
EC की मानें, तो AI और सोशल मीडिया की आड़ में ये फुटेज मानहानि और फेक नरेटिव फैलाने में इस्तेमाल हो रही थी, इसलिए इसे हटाना ज़रूरी था।
3. पहले क्या था रिवाज?
पहले यह डेटा कम से कम एक साल तक रखा जाता था, ताकि किसी को भी आवश्यकता पड़ने पर जांच या सत्यापन के लिए अनुरोध कर सके। कई कानूनी दावे या चुनाव संबंधी शिकायतें इसी रिकॉर्ड पर आधारित होती थीं।
4. कांग्रेस का तर्क – लोकतंत्र खतरे में!
इस नए आदेश पर कांग्रेस पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी का कहना है:
- “लोकतंत्र के खिलाफ” – कांग्रेस ने आरोप लगाया कि इस निर्णय से लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता खत्म हो गई।
- “आयोग और मोदी सरकार लोग डिबेट को चुप करा रहे हैं।”
- “पहले दस्तावेज सार्वजनिक किए, अब रिकॉर्ड मिटाया जा रहा है!”
- कांग्रेस का कहना है कि यह आदेश तुरंत रद्द होना चाहिए, वरना भ्रष्टाचार और फर्जी सूचनाओं का भंडार कभी मिटता नहीं।
यह विरोध सीबीआई दिल्ली टाइम्स ट्वीट (शुक्रवार रात 10 बजे) के माध्यम से सामने आया है।
5. पहले भी बदलाव हो चुका है
- 20 दिसंबर 2024 को केंद्र सरकार ने CCTV, वेबकास्टिंग और उम्मीदवार वीडियो को सार्वजनिक करने से रोक दिया था।
- इसका बहाना था कि AI एडिटिंग से फेक फुटेज बनाया जा सकता है, जिससे फेकन्यूज़ फैल सकती है। उसमें कहा गया था कि यह सिर्फ उम्मीदवारों और पार्टियों के लिए उपलब्ध रहेगा, अन्य लोग कोर्ट में अपील कर सकते हैं।
6. क्यों इतने विवादित कदम?
- पारदर्शिता बनाम सुरक्षा –
रक्षा पक्ष कहता है कि यह कदम भ्रामक सूचना रोकने के लिए जरूरी है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि इससे वोटर जांच और नज़र रखने की स्वतंत्रता सीमित होती है। - लोकतांत्रिक जवाबदेही –
एक ऑडिट, शिकायत या चुनाव आयोग के निर्णय की समीक्षा के लिए रिकॉर्ड की उपलब्धता उद्देश्यपूर्ण होती है। इससे चुनाव प्रक्रिया में विश्वास बनता है।
7. अब क्या होगा?
- कांग्रेसी नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि यह कदम “चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर हमला है”।
- अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
- विपक्षी दल मिलकर इस कानून को बार-बार EC और केंद्र सरकार के खिलाफ लोकसभा, राज्यसभा या प्रदर्शन के जरिए चुनौती दे सकते हैं।
8. वास्तविकता से बेहतर बचाव चुन रहे हैं
चुनावों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और सूचना तक पहुंच लोकतंत्र की रीढ़ होती है।
चुनाव आयोग का नया नियम 45 दिन बाद डेटा मिटा देना, जिससे वोटर और मीडिया दोनों का नियंत्रण कम हो सकता है, विवादास्पद है।
इसके पीछे छिपा सवाल है—क्या हम वास्तविकता से बेहतर बचाव चुन रहे हैं, या लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं?
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