durg chandi mandir: शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर से शुरू हो रही है और इसके साथ ही पूरे छत्तीसगढ़ में धार्मिक उत्साह का माहौल है। इस दौरान दुर्ग जिले के दो ऐतिहासिक मंदिर, चंडी माता मंदिर और सतरूपा शीतला माता मंदिर, विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। ये न सिर्फ आध्यात्मिक ऊर्जा के स्रोत हैं, बल्कि इनसे जुड़ी कथाएं और मान्यताएं भी भक्तों की आस्था को गहराई से प्रभावित करती हैं।
250 साल पुराना चंडी माता मंदिर
चंडी मंदिर दुर्ग जिले का 250 साल पुराना मंदिर है। दुर्ग जब जिला नहीं बना था 1906 तब से यह मंदिर है। मंदिर की विशेषता है कि यहां एक कुंड है, जिसे चंडी कुंड कहते हैं। जिसमें सालभर पानी भरा रहता है। कभी सूखता नहीं है। यह कुंड मंदिर की प्राचीनता का प्रमाण माना जाता है। इस बार नवरात्रि में यहां 2600 से ज्यादा कलश की स्थापना की जा रही है।
नहीं लौटता कोई खाली हाथ
मंदिर में देवी चंडी के साथ-साथ मां दुर्गा, मां अन्नपूर्णा और भगवान श्रीगणेश की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं। भक्तों की मान्यता है कि मां चंडी के दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटता। कुछ विशेष पूजा-अर्चना और नवरात्रि के समय मनोकामना जोत (ज्योति कलश) प्रज्वलित की जाती है।
राजस्थान के खास पत्थर से बना प्रवेश द्वार
मंदिर के जीर्णोद्धार का काम हाल ही में पूरा किया गया है। सजावट और अन्य सौंदर्यीकरण के काम जारी हैं। जीर्णोद्धार के लिए राजस्थान से लाल और पीले रंग के पत्थर मंगवाए गए हैं ताकि मंदिर और प्रवेश द्वार को और भव्य बनाया जा सके।गर्भगृह की दीवारों पर देवी-देवताओं की छवियां सुंदरता से उकेरी गई हैं। ओडिशा से भी लाए गए कलाकृति वाले आकर्षक गेट लगाए गए हैं।
सात देवियों की एक साथ उपासना
सतरूपा शीतला सेवा समिति के सदस्य रोमनाथा साहू ने बताया कि मंदिर दुर्ग शहर के सिविल लाइन कसारीडीह क्षेत्र में स्थित है। सतरूपा शीतला माता मंदिर की स्थापना लगभग 100 से 150 साल पहले हुई थी। बताया जाता है कि यहां माता शीतला की स्वयंभू मूर्ति भूमि से प्रकट हुई थी। लोगों ने इसे देवी का चमत्कार माना और उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया।समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था बढ़ती गई और मंदिर का विस्तार हुआ। यहां विराजमान देवियों को सात बहनें भी कहा जाता है, इसीलिए इसका नाम ‘सतरूपा मंदिर’ पड़ा।नवरात्रि के समय यहां विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है और दूर-दराज से भक्त यहां आकर दर्शन करते हैं। इस बार यहां 1500 से ज्यादा कलश की स्थापना की जा रही है।
7 बहनों ने लिया था रक्षा का व्रत
यह मंदिर शक्ति-उपासना का प्रमुख केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां विराजमान सात रूपों वाली देवी भक्तों की रक्षा करती हैं और मनोकामनाएं पूरी करती हैं।स्थानीय लोगों के अनुसार, सात बहनों ने इस क्षेत्र की रक्षा का व्रत लिया था, तभी से उनकी पूजा की परंपरा चली आ रही है। नवरात्रि में यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं, कलश-स्थापना व अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है। इस मंदिर को ‘मनोकामना सिद्ध पीठ’ के रूप में भी जाना जाता है।
सात देवियों का एक साथ मंदिर
सात देवियों का एक साथ मंदिर यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। मंदिर परिसर में माता शीतला के साथ-साथ अन्य रूपों की प्रतिमाएं विराजमान हैं। नवरात्रि और अन्य पर्वों पर यहां मेला-सा वातावरण बन जाता है।मंदिर के पास एक कुंड भी है जिसे स्वास्थ्य और शुद्धता से जोड़ा जाता है। भक्त यहां विशेष रूप से कलश प्रज्वलन, अखंड ज्योति और दुर्गा पाठ करवाते हैं।
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