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 जब एक बच्ची ने दम तोड़ा, सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान: जनहित याचिका दर्ज

Shital Sharma July 29, 2025

 टिप्पणी- 37 लाख डॉग बाइट्स और डरावनी खामोशी  

26 जुलाई 2024 को दिल्ली की छह साल की छवि शर्मा दुनिया छोड़ गई। कुछ दिन पहले उसे एक आवारा कुत्ते ने काटा था। इलाज हुआ, वैक्सीन लगी लेकिन बचाई नहीं जा सकी। एक मासूम जान गई और हमारी आंखें तब खुलीं।

Dog Bite Guide
Dog Bite Guide

हमने उस एक मौत को महसूस किया। पर सच्चाई ये है कि ऐसी मौतें हर साल हो रही हैं बस खबर नहीं बन रहीं। अब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस पर नोटिस लिया है। कोर्ट ने साफ कहा “यह आंकड़े सिर्फ आंकड़े नहीं, एक भयावह सच्चाई हैं।”

 क्या 37 लाख डॉग बाइट्स सिर्फ आंकड़े हैं?

22 जुलाई को संसद में पशुपालन राज्य मंत्री एसपी सिंह बघेल ने बताया कि इस साल यानी 2024 में अब तक 37 लाख से ज्यादा कुत्तों के काटने के केस सामने आ चुके हैं। और इन हमलों से 54 लोगों की मौत हो चुकी है रेबीज से।

अब सोचिए हर दिन औसतन 10,000 से ज़्यादा लोग कुत्तों से कट रहे हैं। हर दिन कम से कम एक जान रेबीज से जा रही है। और ये सिर्फ दर्ज आंकड़े हैं… असल संख्या कितनी होगी, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल है।

दिल्ली में ही डॉग बाइट्स में 143% की बढ़ोतरी हुई है। सबसे ज्यादा केस महाराष्ट्र में दर्ज हुए हैं। और सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा 5 लाख से ज्यादा पीड़ित 15 साल से कम उम्र के बच्चे हैं। हर सात में से एक पीड़ित बच्चा।

 सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: जब डर ने अदालत का दरवाजा खटखटाया 

इस पूरे मामले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने स्वत: संज्ञान लिया। उन्होंने रिपोर्ट को जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया और कहा कि यह रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश (CJI) के सामने उचित आदेशों के लिए रखी जाए।

बेंच ने कहा,

“हर दिन, खासकर दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में, सैकड़ों डॉग बाइट्स हो रहे हैं। बुजुर्ग और बच्चे सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं। ये बेहद चिंताजनक है।“

पहले भी, 15 जुलाई को नोएडा में कुत्तों को खिलाने के लिए जगह तय करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था

“अगर आप कुत्तों को खाना देना चाहते हैं, तो घर में दीजिए। सार्वजनिक जगहों पर लोगों की सुरक्षा ज्यादा ज़रूरी है।“

यह बात दो टूक थी सहानुभूति और सुरक्षा के बीच संतुलन ज़रूरी है।

बात कानून या कोर्ट की नहीं हमारी लापरवाही की भी है

एक तरफ कुछ संगठन और लोग जानवरों के प्रति दया दिखाने की बात करते हैं जो कि जरूरी भी है। लेकिन सवाल ये है क्या हमने इसके लिए एक सिस्टम बनाया है? सड़कों पर खुले घूमते हजारों कुत्ते, ना कोई निगरानी, ना कोई वैक्सीनेशन रिकॉर्ड। जब तक किसी का बच्चा अस्पताल न पहुंचे, कोई शिकायत नहीं होती। और जब अस्पताल से लाश लौटती है तब जाकर अख़बार के हेडलाइन बनती है।

हम सबने कहीं ना कहीं ये “नॉर्मल” मान लिया है कि “कुत्ता काट ले, तो इंजेक्शन लगवा लो।” लेकिन हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता। छवि शर्मा का मामला याद रखें इंजेक्शन लगे, फिर भी बचाया नहीं जा सका।

 अब भी नहीं चेते, तो अगली छवि कौन होगी?

सुप्रीम कोर्ट ने जो किया, वह जरूरी था। लेकिन अदालत सिर्फ दिशा दिखा सकती है जिम्मेदारी तो हमारी है।

सरकारों को चाहिए कि:

  • सख्त डॉग कंट्रोल नीति बनाई जाए
  • नसबंदी और वैक्सीनेशन पर असली काम हो
  • नागरिकों को जागरूक किया जाए
  • और सबसे जरूरी पब्लिक सेफ्टी को सर्वोपरि रखा जाए

हमें पशु प्रेम और सार्वजनिक सुरक्षा में संतुलन बैठाना होगा। वरना अगली छवि, अगली खबर, अगली मौत… सिर्फ नाम बदलेगा दर्द वही रहेगा।

Municipal Corporation Meeting: स्ट्रीट डॉग्स के एक करोड़ कहां गए?

आपके मोहल्ले में डॉग बाइट्स का क्या हाल है?
क्या आप या आपका परिवार इससे कभी प्रभावित हुआ है?
कमेंट में अपनी बात जरूर कहें आपकी आवाज़ से बदलाव आ सकता है। 

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i am contant writer last 10 Years, worked with Vision world news channel, Sadhna News, Bharat Samachar and many web portals.

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