dewas chamunda devi: मध्य प्रदेश के देवास शहर की टेकरी पहाड़ी पर स्थित तुलजा भवानी और चामुंडा देवी का धाम भारतीय जनमानस में विशेष श्रद्धा और भक्ति का केंद्र है। यहां दो जागृत देवियां विराजित हैं, जिन्हें बड़ी माता (तुलजा भवानी) और छोटी माता (चामुंडा देवी) के नाम से जाना जाता है। यह स्थान केवल पूजा-पाठ का केंद्र नहीं, बल्कि चमत्कारों और गूढ़ शक्तियों से जुड़ा एक पवित्र स्थल है।
माता सती के रक्त से उत्पन्न हुईं तुलजा और चामुंडा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने यज्ञ में अपने प्राण त्यागे, तो उनके शरीर से गिरी रक्त की दो बूंदों से इन दोनों माताओं की उत्पत्ति हुई। इसी कारण तुलजा भवानी और चामुंडा देवी को शक्ति के अत्यंत जागृत रूप माना जाता है। इनकी मूर्तियां स्वयंभू मानी जाती हैं और यह विश्वास है कि दोनों देवियां आज भी चेतन अवस्था में यहां विराजमान हैं।
बहनों की अनबन और पाताल तक पहुंची कथा
एक लोककथा के अनुसार, एक बार बड़ी माता और छोटी माता में किसी बात को लेकर मतभेद हो गया था। इससे क्रोधित होकर बड़ी माता पाताल में समाने लगीं और छोटी माता टेकरी छोड़ने लगीं। उसी समय हनुमान जी और भेरू बाबा ने उन्हें रोकने की प्रार्थना की। बड़ी माता आधे शरीर तक पाताल में समा चुकी थीं और उसी अवस्था में रुक गईं। छोटी माता भी क्रोधित होकर उतर रही थीं और वहीं रुक गईं। आज भी दोनों माताएं उसी स्वरूप में विराजमान हैं, जो भक्तों के लिए एक रहस्य और आस्था का अद्वितीय संगम है।
दिन में तीन बार बदलती हैं माता के स्वरूप
देवस्थान के पुजारियों और भक्तों के अनुसार, यहां की माताएं दिन में तीन बार अपना रूप बदलती हैं।
सुबह के समय, माता का बाल्य रूप देखा जाता है।
दोपहर में, वे युवती के रूप में होती हैं।
और रात्रि के समय, उनका वृद्धा रूप प्रकट होता है।यह चमत्कारिक रूपांतरण न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाता है कि यह धाम सामान्य मंदिरों से अलग, एक जीवंत शक्ति का केंद्र है।
नवरात्रि में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब
नवरात्रि के नौ दिन यहां विशेष उत्सव का माहौल होता है। टेकरी पर लाखों श्रद्धालु रोज दर्शन के लिए पहुंचते हैं। अष्टमी और नवमी को देवास रियासत के राजपरिवार द्वारा शाही हवन यज्ञ का आयोजन होता है। पूरे शहर में भव्य पंडाल सजते हैं, माता की झांकियां निकलती हैं और जगह-जगह भंडारे लगते हैं। यह उत्सव केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भी प्रतीक बन जाता है।
मन्नतों की पूर्ति का चमत्कारी स्थल
इस धाम की एक खास परंपरा है —
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श्रद्धालु यहां उल्टा स्वास्तिक बनाकर मन्नत मांगते हैं। जब मन्नत पूरी हो जाती है, तो वे माता के चरणों में आकर सीधा स्वास्तिक बनाकर आभार व्यक्त करते हैं। विशेष रूप से वे महिलाएं जो संतान सुख की इच्छा रखती हैं, यदि लगातार पांच दिनों तक माता को पान का बीड़ा चढ़ाती हैं, तो माना जाता है कि माता उन्हें संतान सुख अवश्य प्रदान करती हैं।
तपोभूमि जहां ऋषियों ने की साधना
देवास की यह टेकरी केवल देवी मंदिर नहीं है, यह एक तपोभूमि भी है। यहां गुरु गोरखनाथ, राजा विक्रमादित्य के भाई राजा भर्तृहरि, और सद्गुरु योगेंद्र शीलनाथ महाराज जैसे महान संतों ने वर्षों तक घोर तपस्या की। आज भी नाथ संप्रदाय के साधु यहां पूजा करते हैं और मंदिर की आरती का संचालन करते हैं।
आरती का तय क्रम और दैनिक पूजा
यहां हर रोज माता की आरती एक विशेष समय पर होती है।
सुबह 6 बजे बड़ी माता (तुलजा भवानी) की आरती होती है।
सुबह 7 बजे छोटी माता (चामुंडा देवी) की आरती होती है।
शाम को भी यही क्रम दोहराया जाता है।
इस आरती में शामिल होना भक्तों के लिए एक बेहद दिव्य अनुभव होता है।
देवास की टेकरी — जीवित आस्था की मिसाल
देवास की टेकरी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित आस्था, चमत्कार और शक्ति का केंद्र है। यहां हर श्रद्धालु को माता की उपस्थिति और कृपा का अनुभव होता है। चाहे संतान सुख की कामना हो, जीवन में सफलता की चाह हो या आंतरिक शांति की तलाश — जो भी सच्चे मन से यहां आता है, उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। यहां की हवा, वातावरण और माता की मूर्तियों से निकलने वाली ऊर्जा इस बात का प्रमाण है कि मां आज भी साक्षात रूप में यहां विराजमान हैं।
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