IED और हथियार बरामद, जब हमारी ही मिट्टी में उगने लगीं बारूद की फसलें
दिल्ली की भीड़भाड़ वाली गलियों से लेकर झारखंड के लॉज तक, मध्यप्रदेश के कस्बों से लेकर तेलंगाना के कोनों तक… देश के चार राज्यों में फैले पांच युवाओं को जब सुरक्षा एजेंसियों ने धर दबोचा, तो उनकी झोली में किताबें या कलम नहीं, बारूद, एसिड, बॉल बेयरिंग और हथियार मिले।

ये कोई फिल्म की कहानी नहीं है। ये वास्तविकता है, और डरावनी भी।
साजिश का खुलासा: सोशल मीडिया से शुरू हुआ आतंक का सफर
गिरफ्तार किए गए सभी युवक 20 से 25 साल की उम्र के हैं। ACP प्रमोद सिंह कुशवाहा के मुताबिक, इनका लीडर दानिश था — झारखंड का रहने वाला। सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी हैंडलर से जुड़ा। उसने इन्हें “CEO गजवा” नाम दिया और “खिलाफत मॉडल” अपनाने को कहा। क्या आपको अंदाज़ा है, ये क्या दर्शाता है?
ये दर्शाता है कि हमारे देश के युवाओं को सोशल मीडिया के ज़रिए ब्रेनवॉश किया जा रहा है। उन्हें Jihad और आतंक की ओर मोड़ा जा रहा है। और वो भी चुपचाप, बिना शोर किए।
ये कोई साधारण गिरफ्तारियां नहीं हैं…
जिन सामानों की बरामदगी हुई, उन्हें देखकर कोई भी सिहर उठेगा
- सल्फर पाउडर, सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक एसिड – IED (बम) बनाने के लिए ज़रूरी रसायन
- बॉल बेयरिंग, सर्किट वायर, मदरबोर्ड, लैपटॉप – घातक विस्फोटकों में तब्दील होने वाले छोटे-छोटे पुर्जे
- हथियार, सेफ्टी गॉगल्स, रेस्पिरेटरी मास्क – सब कुछ जैसे किसी लैब में बना हो
दानिश और आफताब, दोनों ने साथ में दिल्ली में रहकर काम को अंजाम देने की योजना बनाई थी। आफताब अंसारी, जो पहले मीट का काम करता था, उसे “टारगेटेड किलिंग” की जिम्मेदारी दी गई थी। कामरान कुरैशी (रायगढ़, MP) और हुजेफा (निजामाबाद, तेलंगाना) जैसे लोग भी इस साजिश का हिस्सा थे।
सोचिए, आज सोशल मीडिया कितना शक्तिशाली हो चुका है…
जहां हम YouTube पर वीडियो देखकर हंसते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ युवा Telegram, Instagram और Dark Web के ज़रिए आतंक का पाठ पढ़ रहे हैं। कट्टरता अब हथियारों से नहीं, स्क्रीन से आती है। और उसका टारगेट – हमारे देश के भोले युवा।

एक कदम और, और हो सकता था बड़ा विस्फोट
दिल्ली पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों ने सही वक्त पर कार्रवाई करके देश को एक बड़ी त्रासदी से बचा लिया है। लेकिन ये केवल एक सतर्कता की जीत नहीं, ये एक चेतावनी भी है। अगर हम अब भी नहीं जागे, अगर हम अब भी “ये तो बस पांच लड़के थे” कहकर बात को टालते रहे,
तो अगली बार शायद वक्त नहीं मिलेगा।
समाज को अब सिर्फ पुलिस नहीं बचा सकती…
अगर कोई युवा अचानक अलग-थलग पड़ जाए, अचानक कट्टर धार्मिक बातें करने लगे, या किसी अजीब नेटवर्क से जुड़ जाए — तो आंखें मूंदना बंद कीजिए। संवाद कीजिए, समझाइए, और ज़रूरत पड़े तो सुरक्षा एजेंसियों को सूचित कीजिए। क्योंकि आतंकवाद अब सिर्फ बॉर्डर से नहीं आता, वो व्हाट्सएप चैट्स और हैशटैग्स के रास्ते हमारे बच्चों तक पहुंचता है।
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